भगवान को मनाया, क्या भगवान की बात मानी ?

भगवान को मनाया, क्या भगवान की बात मानी?
आस्था, उत्सव और हमारा सिविक सेंस
डॉ.सुदेश चुघ
गणपति बप्पा घर में आए,
ढोल बजे, जयकार हुआ,
मोदक की खुशबू फैली,
मन में पावन प्यार हुआ।
पर बप्पा ने चुपके से पूछा—
“एक बात बताओ भक्तों,
मुझे पूजने आए हो तुम,
या मेरी सीख भुलाने?”
मैंने पूछा—“बप्पा! कैसी सीख?”
मुस्काकर बोले—
“जिस धरती पर मेरा मंडप सजता,
क्या वह धरती मेरी नहीं?”
“मेरी मूर्ति को फूल चढ़ाते,
फूल चढ़ाकर बाहर फेंकते,
नैवेद्य मुझको प्रेम से देते,
पत्तल सड़क किनारे फेंकते!”
अरे!
भक्ति हाथ जोड़ने में ही है,
या हाथ से कचरा उठाने में भी?
गणपति के आगे स्वच्छता रखकर
घर चमका लेते हैं,
फिर पूजा पूरी होते ही
गलियों को क्यों मैला करते हैं?
गीला अलग, सूखा अलग—
इतना तो कर सकते हैं,
दो थैलों में कचरा रखकर
शहर का भार घटा सकते हैं।
एक तरफ़ “स्वच्छ भारत” लिखते,
दूसरी तरफ़ वही कचरा,
फिर किससे उम्मीद लगाएँ हम—
नगरपालिका से या भगवान से ज़्यादा?
सिविक सेंस कोई भारी शब्द नहीं,
बस इतनी-सी पहचान—
जहाँ हम रहते हैं,
वहाँ हमारी जिम्मेदारी भी रहती है।
मंदिर जाएँ, मस्जिद जाएँ,
गुरुद्वारा या चर्च जाएँ,
लेकिन जाते-जाते अपनी
गंदगी क्यों छोड़ आएँ?
और सुनिए—
उत्सव है तो उत्साह होगा,
ढोल होगा, संगीत होगा,
पर क्या मेरी खुशी इतनी बड़ी
कि किसी की तकलीफ छोटी हो जाए?
सामने अस्पताल हो,
किसी कमरे में मरीज हो,
किसी माँ की आँखों में चिंता,
किसी पिता की साँसों में डर हो—
और बाहर हमारी आवाज़
आसमान तक जाती जाए!
ज़रा ठहरिए…
भगवान के कान बहरे नहीं हैं,
उन्हें सुनाने के लिए
लाउडस्पीकर की जरूरत नहीं।
महाराष्ट्र की धरती ने तो
उत्सव को समाज से जोड़ा है,
तो फिर उत्सव ऐसा हो
जो समाज को भी थोड़ा सँवारे।
रास्ते में जुलूस निकले—
श्रद्धा से निकले, शान से निकले,
पर एम्बुलेंस रास्ते में आए
तो पहले रास्ता उसे मिले।
लाल बत्ती लाल है—रुकना है,
पुलिस का हाथ भी आदेश है,
“मुझे जल्दी है”—यह तर्क नहीं,
दूसरे का जीवन भी विशेष है।
एक मिनट बचाने की खातिर
किसी की जिंदगी न हारें,
त्योहार मनाएँ पूरे मन से,
पर नियमों का मान भी रखें।
और यह सड़क किसकी है?
मेरी भी, आपकी भी।
यह पार्क किसका है?
मेरी भी, आपकी भी।
यह बेंच, यह दीवार,
यह बिजली का खंभा,
यह सार्वजनिक नल,
यह बस-स्टॉप—
सरकार का कहकर छोड़ न दीजिए,
सरकार भी तो हमसे ही है।
दीवार पर नाम लिखकर
हम अमर नहीं हो जाते,
सार्वजनिक संपत्ति बचाकर
हम संस्कारवान कहलाते।
और प्रकृति?
पेड़ को प्रणाम करेंगे,
फिर उसी पेड़ के नीचे
प्लास्टिक की बोतल छोड़ देंगे?
नदी को माँ कहेंगे,
फिर पूजा का सारा कचरा
उसी माँ की गोद में डाल देंगे?
माँ को चुनरी चढ़ाना श्रद्धा है,
माँ की गोद साफ रखना संस्कार।
यहीं तो फर्क है
केवल आस्था और जिम्मेदार आस्था में!
उत्सव समाप्त हो जाए,
मंडप हट जाए,
रोशनी बुझ जाए,
ढोल थम जाए—
लेकिन अगर हमारे भीतर
एक अच्छी आदत जग जाए,
तो समझिए बप्पा
सचमुच घर आए थे।
उन्होंने मोदक नहीं माँगा,
उन्होंने महँगा चढ़ावा नहीं माँगा,
उन्होंने बस इतना चाहा—
“मेरे भक्त!
मेरे नाम पर एक ऐसा काम करो
कि तुम्हारे कारण
किसी दूसरे को परेशानी न हो।”
तो आइए इस बार
गणपति से केवल यह न माँगें—
“बप्पा, मेरी मनोकामना पूरी करना।”
एक छोटी-सी मनोकामना
हम अपनी भी पूरी करें—
“बप्पा!
मुझे ऐसा नागरिक बनाना
कि मेरा उत्सव किसी का कष्ट न बने,
मेरी आस्था किसी का अधिकार न छीने,
मेरी खुशी किसी की शांति न तोड़े,
और मेरे पीछे
गंदगी नहीं—
एक अच्छी मिसाल रह जाए।”
तब कहेंगे—
गणपति बप्पा मोरया!
स्वच्छ मन—स्वच्छ नगर—मोरया!
जिम्मेदार नागरिक—मोरया!
क्योंकि—
भगवान को मनाना बहुत आसान है,
भगवान की बात मानना कठिन है;
और जिस दिन हमने यह कठिन काम कर लिया,
उस दिन हमारी आस्था
सचमुच महान होगी ।
डॉक्टर सुदेश चुघ
धनबाद, झारखंड



