शिक्षा और प्रेरणा

हर अनुभव में एक गुरु
” शिक्षा और प्रेरणा ”
हर गुरु कक्षा में मिले, यह ज़रूरी तो नहीं,
हर पाठ किताबों में मिले, यह ज़रूरी तो नहीं।
कभी अक्षर हाथ पकड़कर जीवन राह दिखाते हैं,
कभी मौन खड़े माता-पिता ही जीना सिखाते हैं।
कभी रिश्तों की गर्माहट में संस्कारों का पाठ मिला,
कभी किसी अपने के जाने से जीवन का सत्य मिला।
कभी प्रकृति ने धैर्य सिखाया, कभी समय ने चाल,
कभी सफ़र ने राह बताई, कभी संघर्ष ने ढाल।
जो गिरकर भी उठना सिखाए—वही गुरु है,
जो आँसू में मुस्काना सिखाए—वही गुरु है।
जो केवल अक्षर नहीं, जीवन का अर्थ समझा दे,
जो अँधियारे में भीतर का दीप जला दे—वही गुरु है।
कभी हार हमारी शिक्षक बनकर आई,
कभी सफलता ने विनम्रता सिखलाई।
कभी आलोचना ने अपनी कमी दिखाई,
कभी किसी अजनबी की करुणा ने इंसानियत सिखाई।
कभी काँटों ने पाँव सँभालना सिखाया,
कभी फूलों ने मुस्काना सिखाया।
कभी पतझड़ ने छोड़ना समझाया,
तो कभी बसंत ने फिर से खिलना सिखाया।
माँ ने ममता का पहला अक्षर लिखाया,
पिता ने कठिन राह पर चलना सिखाया।
किताबों ने विचारों को आकाश दिया,
और जीवन ने हर दिन नया पाठ दिया।
समय कहता रहा—“ठहरो मत, आगे बढ़ते जाना,”
संघर्ष कहता रहा—“टूटो नहीं, स्वयं को आज़माना।”
सफ़र ने समझाया—मंज़िल से अधिक राह प्यारी है,
और जिंदगी ने कहा—हर सुबह नई तैयारी है।
जिसने हमें थोड़ा बेहतर इंसान बनाया,
जिसने अज्ञान का कोई पर्दा हटाया,
जिसने गिरते हुए हाथ थाम लिया,
उस हर व्यक्ति को गुरु का सम्मान दिया।
गुरु वह नहीं जो केवल पाठ पढ़ाता है,
गुरु वह है जो जीवन को अर्थ बताता है।
वह ज्ञान के साथ विवेक की लौ जलाता है,
और अँधेरे समय में सही दिशा दिखाता है।
इसलिए आज मैं नमन करूँ उस हर शिक्षक को,
जो मिला कभी शब्दों में, कभी रिश्तों के रूप में।
कभी प्रकृति, कभी समय, कभी संघर्ष बनकर,
कभी सफलता, कभी असफलता के अनुभव बनकर।
शिक्षा वही, जो चरित्र सँवार दे,
ज्ञान वही, जो अहंकार उतार दे।
प्रेरणा वही, जो जीवन बदल दे,
और गुरु वही—जो हमें जीना सिखा दे।
न कोई कक्षा छोटी है, न कोई पाठ पुराना है,
जीवन की हर ठोकर में कोई ज्ञान छुपाना है।
जिसने भी हमें सँवारा, उसका ऋण कैसे चुकाएँ—
गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा जीवन ही गुरुकुल है।
— डॉ. सुदेश चुघ,
राष्ट्रीय साहित्यकारा,
धनबाद, झारखंड



