नानी की संदूक

नानी की संदूक
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नानी की संदूक हमारे लिए
किसी धरोहर से कम न थी।
जब भी संदूक खुलती
मैं फूली न समाती।
संदूक के कोने में थी
बहुत पुरानी नानाजी जी की रखी फाइलें
जिसके पन्ने छूते ही फट जाते,
छुईमुई सी।
संदूक में सहेजी हुई थी
नानाजी के अपने दोस्तों के साथ
देखे हुए सिनेमा घरों के तमाम टिकटें ।
संदूक में रखी थी
नानाजी के लिखे हुए अंगिका काव्य संग्रह के
वो पुस्तकें जो इस इंतजार में थी
कि आने वाली पीढ़ियों के
हाथों की लकीरों को कब उकेरेगी।
और नानी के संदूक में थी
वो चिट्ठी जो मामाजी छात्रावास से लिखते थे।
वो अंतर्देशी लिफाफे या केवल पोस्टकार्ड नहीं थे
उन चिठ्ठियों में होती थी
नानाजी के लिए सम्मान ,
नानाजी के बताए हुए सीखें,
खट्टी मीठी बातें,खट्टी मीठी यादें।
और उन चिट्ठियों में होती
नानाजी के दिखाए सच्चे राह पर चलने की हिम्मत।
हरगिज न टूटने वाला भरोसा।
नानी के संदूक में होती
तकिए के नीचे रखे हुए
नानाजी के हाथों लिखे कागज के वो टुकड़े जिनपर मोतियों से अक्षर वाले कविताएं लिखी होती,
जिसे घर बुहारते वक्त
अक्सर नानी सहेज कर रख देती।
नानी के संदूक के एक कोने में
होती थी एक रजाई भी
जो सफेद टीनो पॉल के साथ
अपनी सुगबुगाहट लिए
नानाजी के स्पर्श को सहेज रखी थी।
नाना जी के पीढ़ी दर पीढ़ी की
यादें भी सहेजी थी उन संदूक में।
नानी की वो संदूक
नानाजी के गैर मौजूदगी में भी
मौजूदगी की एहसास थी।
नानाजी की धरोहर
अनमोल संदूक।
© अपर्णा सिंह
जामताड़ा झारखंड



