मन के पन्नों के मौसम

मन के पन्नों के मौसम
(रचना)
डॉ सुदेश चुघ
बचपन में आकाश को, तकती थी दिन-रात।
हवाई जहाज़ों में बसी, सपनों की बारात॥
दूजे घर की कार देख, मन में उठी उमंग।
मेरे घर भी आएगी, यही रहा था संग॥
गुड़िया, चूड़ी, रंग सब, छोटी-छोटी चाह।
मन ने अपना चित्र था, खींच लिया बेपरवाह॥
बड़ी हुई तो मन कहे— अपना होगा संसार।
मनपसंद इक घर मिलेगा, होगा सुख अपार॥
शादी हुई, घर मिला, बदले कई विधान।
अपनी चाहें रख गई, रिश्तों के सम्मान॥
बच्चों की हर चाह पर, माँ ने खोली गाँठ।
अपनी इच्छा टालकर, बाँधी उनकी बाट॥
फीस, किताबें, कपड़े, सपने—सबका मान।
माँ की छोटी चाह को, मिलता रहा विराम॥
सोफा बदले, गाड़ी आए—मन ने माँगी आस।
“अभी नहीं”—कहते-कहते, बीत गया मधुमास॥
कमाई अपने हाथ में, फिर भी मन चुपचाप।
घर की जरूरत पहले थी, अपना सपना बाद॥
घर में कलह न हो कभी, बच्चे रहें प्रसन्न।
कितने मौसम रोककर, माँ ने रखा मन॥
बेटी की भी चाह थी, माँ पूरी कर न पाई।
जिसने माँ को समझाया था, वही बात लौट आई॥
समय चला, बच्चे बढ़े, उनके बच्चे आए।
नए युग की दौड़ में, पुराने मन रह जाए॥
ए आई के इस दौर में, पीढ़ी बदली चाल।
दादा-दादी के मन का, कौन पढ़ेगा हाल?
इच्छाएँ बूढ़ी नहीं, बूढ़ी होती देह।
मन में बचपन जीवित है, यही प्रकृति का नेह॥
अब न आँसू, न शिकायत, न कोई इल्ज़ाम।
मन के पन्ने खोलकर, करती हूँ प्रणाम॥
एक सवाल मगर अभी, मन में है आबाद—
दूसरों के मौसम सहेजूँ, मेरा मौसम कब आबाद?
उत्तर भी मन दे गया—
उम्मीद किसी और से, क्यों माँगे हर बार?
अपने मन की ऋतु को भी, दे अपना अधिकार॥
उम्र भले ढलती रहे, मन मत होने दो मौन।
जिस दिन अपनी चाह जिए, उस दिन मौसम कौन?
मेरे मन के पन्नों पर, ऋतुएँ बहुत लिखीं—
अब अंतिम पन्ने पर लिखूँ—
“मेरी ऋतु भी मेरी है।”
डॉ.सुदेश चुघ
धनबाद, झारखंड



