रूप दुर्गा मां पंचम

” रूप दुर्गा मां पंचम ”
द्वारे तोरण सज गया,बजता मंगल गान।
दुर्गा मां का आगमन,घर – घर का सम्मान।।
घर घर का सम्मान,प्रथम मां शैल भवानी।
पीहर आयी आज,हमारी दुर्गा रानी।
हल्दी दुर्वा धूप ,मात के चरण पखारे।
लाल चुनरिया तान, आम्र का तोरण द्वारे।।
माता दुर्गा तेज की,द्वितीय पूजन आज।
शिव को पाने के लिए,किया कठिन तप काज।
किया कठिन तप काज,मिलें शिव पति स्वरूपा।
ब्रह्मचारिणी नाम,हिमालय पर्वत गूंजा।।
लिए कमण्डल हाथ, टालती है हर बाधा।
करतीं हैं कल्याण,जगत की दुर्गा माता।।
फैली आभा हिम गिरी,चंद्र विराजे भाल।
नाम चन्द्रघंटा बनी, खड्ग खपर ले ढाल।
खड्ग खपर ले ढाल, भक्त की रक्षा करतीं।
तृतीय रूप स्वरूप,सुरों को भय से भरती।
खुशियाँ भरती भक्त,भरे ममता की थैली।
मां का निर्मल रूप,जगत में आभा फैली।।
पालनहारी जगत की ,सृष्टि रचनाकार।
कमलपुष्प से युक्त है,कूष्मांडा दरबार।।
कूष्मांडा दरबार,कलश अमृत छलकाती।
गदा धनुष ले हाथ,सुरों के हाथ न आती।।
महिषासुर को मार,खड़ी वह रण में भारी।
रचा सृष्टि ब्रह्मांड,जगत की पालनहारी।
पंचम मां स्कन्द की, सुंदर अद्भुत रूप।
बालक कर में खेलता, कार्तिकेय स्वरूप।।
कार्तिकेय स्वरूप,मिला है पुत्र निराला।
कमल पुष्प ले हाथ, कमंडल घेरे माला।।
भाल चमकता तेज,नयन अति मोहक अनुपम।
हृदय दया का द्वार,रूप दुर्गा मां पंचम।।
रिंकु दुबे वैष्णवी
धनबाद, झारखंड



