न्यूज

सत्कर्म खामोशी से ही होते हैं

*कविता : सत्कर्म ख़ामोशी से ही होते हैं! की समीक्षा —*

*काव्य-रचयिता: — दार्शनिक, युग-पुरुष कविवर ‘सूर्य’ |*
*समीक्षक /आलोचक /कवि:— डॉ. यल. कोमुरा रेड्डी |*

*“सत्कर्म खामोशी से ही होते हैं!’*
शीर्षक की यह कविता एक दार्शनिक और चिंतनशील रचना है। कवि ने अपने निजी अनुभवों के माध्यम से एक गहरा संदेश देने का प्रयास किया है।
मूल विचार: कवि ने “सत्कर्म” और “शोर” के बीच के विरोधाभास को उजागर किया है। उनका मानना है कि जब हम अच्छे काम करते हैं, तो वे अक्सर प्रचार-प्रसार से दूर, यानी “खामोशी” में होते हैं।

*अनुभवों का महत्व:*
कवि ने अपनी बात को पुष्ट करने के लिए “मैंने अक्सर अनुभव किया है” जैसी पंक्तियों का उपयोग किया है, जिससे कविता में व्यक्तिगत विश्वास और गहराई की झलक मिलती है।
आत्म-विश्लेषण: कविता में कवि की “बुद्धिमत्ता,” “प्रेम,” और “गहरी भावनात्मक संवेदनशीलता” का उल्लेख है, जो यह दर्शाता है कि कवि अपनी आत्मा और भावनाओं के प्रति सजग है।
*दार्शनिक दृष्टिकोण:*
कवि ने “जीवन का यथार्थ,” और “आत्मिक संवेदनाऐं” जैसे शब्दों का प्रयोग करके अपनी दार्शनिक सोच को प्रकट किया है। उनके अनुसार, अच्छे और नेक कार्यों की असली सुंदरता उनके प्रचार में नहीं, बल्कि उनके होने में निहित है।

*निष्कर्षत:*
यह कविता भारतीय संस्कृति में निहित ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ के सिद्धांत की याद दिलाती है, जहाँ कर्म करने पर जोर है, न कि उसके फल या प्रचार पर। भारतीय संस्कृति अनुरूप दार्शनिक, युग-पुरुष कविवर ‘सूर्य’ जी ने अपनी रचना के माध्यम से एक ऐसे सत्य को प्रस्तुत किया है, जो आत्म-संतोष और निस्वार्थ सेवा का महत्व बताता है।

*सादर!*
*समीक्षक:-*
*डॉ. यल. कोमुरा रेड्डी*
*प्रोफ़ेसर, आलोचक व चिन्तक*
*हिन्दी के सुप्रतिष्ठ साहित्यकार-कवि*
*[ वारंगल ज़िला, तेलंगाना राज्य, भारत ]*

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button