सबसे ममता करती हूँ

” सबसे ममता करती हूँ ”
नाम है ममता मेरा, सबमें ममता भाव,
समता ही मेरा धर्म है, यही मेरा स्वभाव ।
मैं किसी का अपमान करूँ न, चाहे कोई दिल दुखाता है,
खुद में रोकर खुद में सहकर, जोगी मन में रमता है !!
ऊँच- नीच का भेद न जानू, क्यों जग मुझ पर हँसता है,
सभी बड़ों का सम्मान करूँ, छोटों से रिश्ता सजता है ।
अमीर- गरीब मैं न पहचानूँ, भूख भाव से भरता है,
जहाँ भी मिलता प्यार जरा सा, वहीं मेरा दिल रमता है ।
अपमानित न हो कोई मुझसे डर से दिल भी दुखता है,
खुद मे रोकर, खुद मे सहकर, जोगी मन में रमता है ।
जितना सहना हो सह लेती हूँ, यही हार मे जीत मेरी है,
व्यंग बाण- झगड़ों से दूर रहूँ, यही जगत में नीत मेरी है ।
मुझमें नहीं चालाकी कोई, हमें जग बुद्धू कहता है,
गलती सब की क्षमा करूँ मैं, कौन आज ये करता है ?
ईर्ष्या- द्वेष से दूर हूँ मैं, क्यों कोई इसमें जलता है ?
सीख को कुछ भी जहाँ मिलेगा, मन मेरा उछलता है ।
मुझमें खास कोई नियम नहीं, लेकिन अनुशासन हीन नहीं,
जब जी चाहे काम करूँ, यही तो मेरी दीन नहीं ?
हाँ, स्वतंत्र हूँ, स्वच्छंद नहीं, मर्यादा मे बहती हूँ,
नाम ममता है मेरा, ससबसे ही ममता करती हूँ ।।
ममता सिंह,
साहित्यकारा,
महुदा- धनबाद ( झारखंड )



