*नकुड़, सहारनपुर, 24 अगस्त 2026* नकुड़, सहारनपुर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार सुनील कुमार “खुराना” की स्वरचित मौलिक रचना *”पल दो पल”* इन दिनों साहित्य जगत में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर रही है। 27 जनवरी 2026 को प्रकाशित इस रचना को अब तक *19,20,121* पाठकों ने पढ़ा है, जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। *”बन्दे प्यार के रंगों में रंग दे यह दुनिया”* से शुरू होने वाली यह कविता मनुष्य को जीवन की नश्वरता का बोध कराती है। कवि सुनील कुमार खुराना कहते हैं – “कुछ दिन का तू अपने घर का मुखिया, तू इस धरा का पल दो पल का नायक।” यह पंक्ति बताती है कि यह जीवन अस्थायी है और हम सब इस धरती पर थोड़े समय के अभिनेता हैं।
कविता की दूसरी सीख मोह-माया के त्याग की है। “बन्दे सदा हर पल क्या करता मेरा मेरी, अंत समय में कुछ साथ नहीं जाए तेरी।” कवि ने स्पष्ट किया है कि लालच और घमंड व्यर्थ है, क्योंकि अंतिम समय में कुछ भी साथ नहीं जाता। इसलिए मनुष्य को “जग में कर ले कुछ कर्म अपने लायक” चाहिए।
तीसरी सीख कर्म की अमिट छाप की है। “हाथ से लिख अपनी कुछ ऐसी कहानी, उसे सब लोग पढ़े सदा अपनी जुबानी, बन्दे दिल में जला लें कुछ ऐसी पावक।” अर्थात ऐसा कार्य करो जिसे दुनिया याद रखे। चौथी सीख में कवि कहते हैं – “तू सारी धरा पर सत् का दीप जला लें, राहों में सबकी तू सदा फूल खिला लें।” किसी के लिए शायक अर्थात बाधा नहीं बनना चाहिए। सुनील कुमार ने अपनी कविता में अंतिम सीख मधुर वाणी की है। “बन्दे कटु वचन जग में होते तीर समान, तू सदा सोच समझ कर बोल लें जुबान।” कटु वचन तीर के समान घायल करते हैं, इसलिए सबके लिए दायक बनो। यह कविता आज के युवाओं के लिए नैतिक पाठशाला बन गई है।