बेईमानी बन रही है

बेईमानी बन रही है शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट की मुख्य वजह : प्रो राम अवतार
धनबाद : बेरोजगारी पर लगाम कसने का मुख्य औजार है शिक्षा में गुणवत्ता लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि भ्रष्टाचार का आलम इस क्षेत्र को भी बुरी तरह प्रभावित कर रही है। अपने प्राचार्य काल के दौरान इस मामले में बेहद शख्त माने जाने वाले शिक्षक के रूप में इन्होंने अपनी कर्तव्य का निर्वहन किया है। स्वाभाविक रूप से ऐसे में इनकी अपेक्षा होगी कि वही दायित्व दूसरे भी निभाएं। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि मौजूदा दौर में भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी इतनी हावी है कि उससे अब शिक्षा भी अछूती नहीं बची। उन्होंने बताया कि नाम और नाजायज पैसा कमाने के लिए लोग डॉक्टरेट अर्थात पीएचडी भी कर रहे हैं। ऐसे में उसकी गुणवत्ता भी अब नहीं बची रही। शोध प्रबंध (थेसिस) अब अपने अनुसंधान के आधार पर न करके दूसरे से लिखवाकर दिया जा रहा है। इसलिए आज की डॉक्टरेट की भी वह बात नहीं रही। आलम यह है कि इससे भी शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट की एक प्रमुख उदाहरण यह भी है। जानकार सूत्रों के अनुसार हालांकि इसके लिए वर्तमान में यूजीसी ने भी एक ऐप तैयार कर रखा है जिससे जांच की जा रही है लेकिन बहुत से मामले नहीं पकड़ में आते।
पीएचडी करने के लिए शोध प्रबंध की गिरावट बेहद चिंता का विषय है और वह शिक्षा की गुणवत्ता में ह्रास का एक मूल रास्ता है। पढ़ लिखकर आप कितने भी काबिल हो जाए अगर आपके अंदर गुणवत्ता नहीं तो आप किसी लायक नहीं। शिक्षा के क्षेत्र में प्राचार्य और कोषाध्यक्ष होने के नाते उन्होंने प्रशासनिक कार्य भी संभाला है । परीक्षा में नकल पकड़ने वालों में सबसे माहिर रहे प्रो राम अवतार इस बात पर खुद अपने बच्चों से उलझ पडते थे। उन्होंने परीक्षार्थियों को स्पष्ट किया कि परीक्षा नहीं दे अगर चोरी करनी है तो । मैं अपने रहते ऐसा नहीं होने दूंगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर इज्जत बचेगी तो आप महान कहलाएंगे रिश्वत लेंगे तो चर्चा का विषय बनेंगे और समाज में घृणा का पात्र बनेंगे। उन्होंने बताया कि परीक्षार्थियों के साथ उनका रवैया सख्त रहा है और चाहत है कि दूसरे भी उतने ही सख्त रहे। क्योंकि परीक्षा का मतलब परीक्षा होता है स्वेच्छा नहीं । नकल करके आप दूसरे के साथ-साथ अपना भी चरित्र बिगाड़ रहे हैं।
विश्वविद्यालय में विकास के लिए यूजीसी एक्ट का दुरुपयोग आमतौर पर कॉलेजो में होता है।
यहां बता दे की कॉलेज में विकास के लिए आम तौर पर दो रास्ते हैं पहला राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली विकास मद की राशि तथा दूसरा यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन अर्थात (यूजीसी) के मार्फत मिलने वाली राशि । ज्ञात हो कि यूजीसी के आवंटन का तरीका है कि अपने द्वारा विकास मद में दिए गए पहले खर्च का हिसाब मांगती है कि कितना विकास मद में खर्च किया किया तभी अगली राशि आवंटित की जाएगी। ऐसे में कॉलेजो द्वारा प्रबंधन जैसे तैसे फेक हिसाब तैयार कर यूजीसी को भेज देते हैं और नया आवंटन का रास्ता साफ कर लेते हैं। कॉलेजो में विकास के नाम पर घपलेबाजी की यह मुख्य वजह होती है। इस पर रोक यूजीसी नहीं लगा सकती क्योंकि उसके पास ऐसे बहुत से कार्य है ऐसे में उसे छोटे-छोटे हिसाब को लेकर मत्था पच्ची करने की समय नहीं होती। यह कार्य स्वविवेक का है। प्राचार्य और कोषाध्यक्ष शिक्षक विद्यार्थियों को भी अपना परिवार और राष्ट्र का दायित्व समझकर व्यवहार करें तो सब ठीक होगा विकास भी होगी और गुणवत्ता भी आएगी । यूजीसी एक्ट एक सरकारी राशि है जो की जनता के ही फंड से निर्मित है। विकास के साथ जालसाजी न करें अन्यथा स्वयं अपने नजर में गिर जाएंगे।
याद रहे यूजीसी फंड का दुरुपयोग सीधे विद्यार्थी और जनता के साथ जालसाजी है। इससे कल्याण केवल रिश्वतखोरों का होता है विकास तो हो ही नहीं सकती ऐसे में इससे बचने की सलाह उन्होंने कॉलेजो के प्राचार्य व बर्सर को दिया। साथ ही पीएचडी की उपाधि गुणवत्तापूर्ण शोध के आधार पर करने पर जोर दिया । इससे शैक्षणिक हित के साथ-साथ आपका नाम और राष्ट्र की भी सेवा दोनों ही होगी। सिर्फ डिग्री लेना ही पर्याप्त नहीं काबिलियत भी उतनी ही जरूरी है। अन्यथा आप हास्य का पात्र बनेंगे। और बदनाम होने के लिए तैयार रहे।
उमेश तिवारी धनबाद स्वतंत्र वरिष्ठ पत्रकार धनबाद



