जौहर- क्षत्राणियों का स्वाभिमान

जौहर – क्षत्राणियों का स्वाभिमान
आग सिर्फ आग नहीं, वह तो अग्नि देव थे,
शरीर का जल जाना सिर्फ जलना नहीं था,
अपने कुल की मर्यादा की लड़ाई थी।
पति की मौत पे आँखों में आँसू,
पर स्वाभिमान की खातिर चेहरे पर अभिमान था,
गुलामी की जिंदगी से भली,
अग्नि की ज्वाला में तपा वह बदन था।
सोलह श्रृंगार के साथ,
जौहर की खातिर मातृभूमि की रक्षा का बलिदान था,
तलवार हारी रणभूमि में,
जन्मभूमि में अभी भी लड़ाई जारी थी।
देह नहीं, वह क्षत्रिय खून जला,
मातृभूमि की खातिर लड़ना जारी था,
जौहर कर मान रखा राजपुताना रानियों ने,
आसान नहीं था सोलह हजार रानियों का
अग्नि देव को अंग समर्पण।
पर साहस था खून में बलिदानों का,
तुम क्या जानो फटे मुँह बोलने वाले,
मान-मर्यादा, अपने पिया खातिर, जन्मभूमि,
मातृभूमि, स्वाभिमान – सब था,
बस छू न पाए कोई अत्याचारी, अहंकारी,
राक्षस, मुगल हो या आक्रमणकारी,
कोई भी भारतीय नारी की मान-मर्यादा और आबरू पर
न अधिकार कर सके।
बस शान से कर लिया क्षत्राणियों ने
जौहर को अपना हथियार बनाया,
हर-हर महादेव की धारा से गूँजा सारा आसमान।
सती भी हुई अग्नि में भस्म, जब किया अपमान महादेव का सबने,
शक्ति है यह नारियों की,
तुम क्या जानो, आज के युग में इतनी रक्षा, कानून सब मिल जाते हैं।
उस पल को तो याद कर लेते,
जब तलवार की ताकत से जीती जाती थी साम्राज्य,
अग्नि देव साथ देते स्वाभिमान से मरने की खातिर।
अमर है शक्ति नारियाँ,
आज भी गर्व से हम कहते हैं,
भारत की नारियाँ सबसे महान,
देश हमारा भारत प्यारा,
सब देशों से है बड़ा निराला,
इसकी मिट्टी में अब भी खुशबू है,
जौहर के बलिदान की।
सादर,
कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर, बिहार



