पाग-दोपट्टा नहीं, जवाब चाहिए पत्रकारों से एक खुला सवाल

प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
मधुबनी में इन दिनों एक नया चलन है। मीडिया संवाद, सम्मान समारोह, पाग-दोपट्टा, दिन का भोज। मंच सजता है, फोटो खिंचती है, खबर छपती है। सब अच्छा लगता है, पर जमीनी हकीकत वैसी की वैसी रह जाती है।
मैं पूछना चाहता हूँ — क्या पाग-दोपट्टा से मधुबनी की समस्या खत्म हो जाएगी?
*बंद पड़ी हैं हमारी पहचानें*
लोहट चीनी मिल 1996 से बंद है। 1914 में बनी, 225 एकड़ में फैली यह मिल आज खंडहर है। सकरी चीनी मिल वर्षों से बंद है। रैयाम चीनी मिल बंद है। अशोक पेपर मिल जो दरभंगा-मधुबनी की शान था, आज बर्बाद है। इन चार मिलों के बंद होने से न सिर्फ हजारों मजदूर बेरोजगार हुए, बल्कि लाखों किसानों की गन्ना की खेती खत्म हो गई और पूरा मिथिला पलायन को मजबूर हो गया। हर चुनाव में वादा होता है, पर हिसाब कोई नहीं देता कि इनकी जमीन का क्या हुआ?
*और समस्याएं तो बहुत हैं*
कोसी, कमला, भुतही बलान की बाढ़ हर साल फसल बहा ले जाती है। सदर अस्पताल में डॉक्टर नहीं है। स्कूलों में शिक्षक नहीं है। जितवारपुर-रांटी के मिथिला पेंटिंग कलाकारों को दाम नहीं मिलता। युवा रोजगार के लिए बाहर जा रहा है।
*अब मेरा सवाल पत्रकार साथियों से है*
भाइयों, यदि आपको सच में सम्मान चाहिए, तो यह पाग-दोपट्टा वाला सम्मान छोड़ दीजिए।
*यदि सम्मान चाहिए तो गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से लेकर बड़े-बड़े मेडल और राष्ट्रीय सम्मान पाओ। अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, शोषण, अंधविश्वास के खिलाफ कलम चलाओ।*
गणेश शंकर विद्यार्थी ने कलम के लिए अपनी जान दी थी, किसी जनप्रतिनिधि के पाग-दोपट्टा के लिए नहीं। पत्रकारिता का असली सम्मान मंच से नहीं मिलता, जनता के दिल से मिलता है। जब आप गरीब की झोपड़ी, बाढ़ में डूबा खेत और बंद मिल के मजदूर की बात लिखोगे, तो जनता खुद आपको सिर पर बैठाएगी।
हम किसी आयोजन के खिलाफ नहीं हैं। हम सम्मान के खिलाफ नहीं हैं। हम सिर्फ यह कहना चाहते हैं की हम पाग-दोपट्टा और दिन के भोज नहीं, जवाब चाहते हैं!
जनप्रतिनिधि से जवाब चाहिए कि मिल कब चालू होगी? और पत्रकार साथियों से उम्मीद है कि वे सवाल पूछेंगे, पाग – दोपट्टा नहीं गिनेंगे।



