माँ

*माँ*
माँ सम और कहां मिलता इस जीवन में मधु गोरस प्याला।
सींच रही हर बालक को वह अंक लिए भर नेह दुशाला।
लाख सहे दुख आह भरे निज की हर कंटक को निज टाला।
क्या उपमा उस साख लता जिसने फल को अँजुरी भर पाला ।।
जन्म दिया कब कृष्ण यशोमति आँचल में हरि नाम सजाया।
प्रीत सुगंध बनी अनुबंधित प्रेमिल गोकुल धाम बनाया।
नेह मिला जब नेह किसी पथ प्रेम अटूट रहा जग माया।
मां जस हो न सका धरणी पर और कहीं घन शीतल छाया।।
बंधन बांध अलौकिक मां ममता भर उज्ज्वल भाग्य बनाती।
हांथ लिए वह ढाल खड़ी रहती बन रक्षक भाल सजाती।
मार्ग मिले हर जीत दुआ कर शीश सदा शिवधाम नवाती।
मान लिया जग ने बन ज्योति जली वह निश्चय मां कहलाती।
मंदिर में जब शंख बजे मन में जननी छवि दर्प सजी है।
गीत सुनाकर मात सदा ही पाल रही सुत रात जगी है।
द्वैत सखा मिल गान करें महिमा अति मोहक भाव पगी है।
मां ममता मिलती उसको जिसको निज कर्म सुयोग फली है।।
रिंकू दुबे ” वैष्णवी ”
धनबाद, झारखंड



