हिन्दी की पहचान

विषय –हिन्दी की पहचान
कलम बिना स्याही अधुरी है
ठीक वैसे ही स्याही बिन कलम सुखा
बच्चों से बड़ी दुश्मनी की
किस लिए मैंने अग्रेजी स्कूल में रख दी
अपने बच्चों को संस्कृत से दूर की
अपने बुढ़ापे का सहारा छिन गया
बेसहारा मुझे कर दिया।
जो बच्चे दिल के बहुत करीब थे
अंग्रेजी भाषा के कारण मुझे बेसहारा कर गए।
हिन्दी को ठुकराया उसने
अपने घर से निकाला उसने
अपने बच्चों से बड़ी दुश्मनी की
क्यों उनको हिंदी से दूर की।
मेरे आंखों के वे तारा थे
आज मै उनकी नजरों की किरकिरी बन गई
हिन्दी पढ़ाई होती दिल में प्यार जगाई होती
मैंने देखी तेरी बेरुखी
मेरे बच्चे क्यों देखी नहीं तुमने मेरी वेवासी।
बुढ़ापे की तस्वीर एक बेबस रही
किस लिए मैंने बच्चों को हिंदी से दूर की
हर भाषा पराई हुई ,मेरे बच्चे दुश्मन खुदाई हुई
मुझको अफसोस है हिंदी
घर में क्यों नहीं सीखाई सबको हिंदी।
सादर
कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर, बिहार



