कविता हम कौन हैं!

काव्य : हम कौन हैं!
हम कौन हैं
न मुझे पता है
न तुम्हें
बस, भीड़ का
एक हिस्सा हैं
देखते रहते हैं
एक दूसरे को
और तलाशते रह जाते हैं
खुद को
नहीं बता पाते
अपना नाम
अपना पता
फिर सवाल
करते हैं
खुद से
कुछ जवाब तो आता है
लेकिन डूब जाता है
इस भीड़ के
कोलाहल में कोलाहल है कि
बढ़ता ही जाता है
मैं दोनों कानों को
दबोच लेता हूं और भींच लेता हूं आंखें भी,
जरा कोलाहल कम हो जाए
तो बता दूंगा अपना नाम, अपना पता
हर व्यक्ति की
पहचान होती है मेरी भी होगी, लेकिन कैसे बता दूं
क्यों कर बता दूं
तुम मेरे लिए अजनबी हो
और किसी अजनबी के सामने आना
गुनाह है।
तुम भीड़ का हिस्सा हो
और भीड़ एक
षड्यंत्र होती है,
बारूद का ढेर होती है,
कुचल देने वाला
हथियार होती है,
भीड़ से
बचना होगा वरना हम गूंगे, बहरे और
अंधे हो जाएंगे, भविष्य के लिए
कोई अंकुरण न हो पाएगा
हम नपुंसक होकर
रह जाएंगे, धीरे-धीरे
लुप्त होती पीढ़ियो की तरह
अतीत ही कहलाएंगे।
कवि : विकेश निझावान, अम्बाला शहर |



