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कविता

*जीवन के धागे*
थोड़े सुलझे, थोड़े उलझे
जीवन के ये धागे हैं,
कभी मुस्कान के साए में,
कभी आँसू के आगे हैं।
कभी मुस्कान के साए में,
कभी आँसू के आगे हैं,
कभी खुशियों की नर्म डोर,
कभी जीवन का एक छोर।
मन के आँगन में बहती धूप,
कभी जीवन का कठिन रूप,
थोड़े सुलझे, थोड़े उलझे
जीवन के ये धागे हैं।
राहें बदलती, मौसम बदलते,
कुछ रिश्ते बुनते, कुछ टूटते,
हर धागा कुछ कहता है
फिर भी चुप रहता है
जीवन के ये धागे हैं,
सपनों से भी आगे हैं,
थोड़े सुलझे थोड़े उलझे
जीवन के ये धागे हैं।
निलेश वर्मा



