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तुम चंदन हो….. तो मै तुम्हारी सुगंध हूँ “

“तुम चंदन हो… तो मैं तुम्हारी सुगंध हूँ ”

तुम चंदन हो,
शिव के तृपुण्ड की शोभा हो,
तो मैं उस भोले की भक्ति हूँ,
जिसमें तुम हर पल समाए हो।

तुम लकड़ी के चंदन हो,
मस्तक का सुंदर मुकुट हो,
तो मैं उस माथे की आस्था हूँ,
जिस पर तुम्हारा पावन तिलक हो।

तुम चंदन हो,
रघुनंदन के मस्तक का तिलक हो,
तो मैं मर्यादा पुरुषोत्तम की
मर्यादा का अनुकरण हूँ।

तुम पूजा का वंदन हो,
जन-जन का अभिनंदन हो,
तो मैं उन झुके हुए मस्तकों की
निष्कलंक श्रद्धा हूँ।

तुम चंदन हो,
सर्पों के स्नेह का स्पंदन हो,
तो मैं उस विषधर के भीतर छिपी
शिवत्व की पहचान हूँ।

तुम शीतल चंद्रमा को अपने भीतर लिए हो,
तुलसी के हाथों घिसे हो,
माधव के ललाट पर सजे हो—
तो मैं उस तुलसी की भक्ति हूँ,
जो तुम्हें घिसकर भी
तुम्हारी सुगंध बढ़ाती है।

तुम यज्ञ की आहुति हो,
हवन की पवित्रता हो,
पूजन की शुद्धता हो,
तो मैं उन मंत्रों का स्वर हूँ
जो तुम्हारे स्पर्श से
और पावन हो जाते हैं।

तुम वन में खड़ा
पावन-पवित्र वृक्ष हो,
तो मैं उस धरती का प्रण हूँ
जो तुम्हारी जड़ों को
अपनी साँसों से सींचती है।

तुम राम के ललाट पर शोभते हो,
कृष्ण के मस्तक पर मुस्काते हो,
महादेव के तृपुण्ड में बसते हो—
तो मैं उन तीनों के चरणों में
समर्पित सनातन भाव हूँ।

तुम शव का श्रृंगार बनकर
अंतिम यात्रा में भी साथ चलते हो,
तो मैं उस सत्य का साक्षी हूँ
कि—

जीवन की पहली पूजा से
मृत्यु की अंतिम यात्रा तक,
चंदन…
मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।

तुम पर्यावरण का समर्पण हो,
प्रदूषण का दर्पण हो,
अर्पण भी तुम,
तर्पण भी तुम—
तो मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए
धरती बचाने का संकल्प हूँ।

तुम शीतलता हो,
स्वच्छता हो,
सुगंधित पवन का संदेश हो,
तो मैं उस प्रकृति की आवाज़ हूँ
जो कहती है—

वृक्ष बचाओ,
जीवन बचाओ,
सुगंध बचाओ,
अपना कल बचाओ।

तुम दूल्हे के माथे का
पुण्य तिलक बनते हो,
तो मैं उस नवजीवन की
नई शुरुआत हूँ।

तुमने अग्निकुंड झेला है,
तपकर भी सुगंध दी है—
तो मैं तुम्हारे जीवन से निकला
वह संदेश हूँ कि—

जो स्वयं तपता है,
वही दूसरों को शीतलता देता है।

तुमने जिंदगी का मेला देखा,
जन्म से मृत्यु तक सफर किया,
हर पड़ाव पर सुगंध बाँटी—
तो मैं तुम्हारे जीवन का
वह अर्थ हूँ,
जो समय से परे है।

तुम कहते हो—
“मैं चंदन हूँ…”

हाँ, तुम चंदन हो,
पर केवल इसलिए नहीं
कि तुम्हारे भीतर सुगंध है—

तुम चंदन इसलिए हो
क्योंकि स्वयं घिसकर भी
दूसरों के माथे को
शीतलता देते हो।

तुम चंदन हो,
मैं तुम्हारा सम्मान हूँ।
तुम सुगंध हो,
मैं तुम्हारा गुणगान हूँ।
तुम वृक्ष हो,
मैं तुम्हारी छाँव हूँ।
तुम शब्द हो,
मैं तुम्हारा भाव हूँ।

और अंत में इतना ही—

चंदन होना आसान है,
पर चंदन-सा होना कठिन है।
खुद जलकर भी सुगंध देना,
खुद मिटकर भी संसार सँवारना—
यही तो चंदन की पहचान है।

तुम चंदन हो…
और मैं कवि हूँ—

तुम्हें लिखता नहीं,
तुमसे सीखता हूँ।
तुम्हारी सुगंध कहता नहीं,
तुम्हारी सुगंध में जीता हूँ।

तुम चंदन हो…
तो मैं तुम्हारी रचना हूँ।

आचार्य संजय सिंह ‘ चंदन ‘
धनबाद, झारखंड

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