स्काउट शिविर की स्मृतियाँ

“पल पल तारे टूट रहे हैं किस्मत के गलियारे में।
सारे ख्वाब छिपे बैठे हैं जाने क्यों अँधियारे में।।”
यात्रा सिर्फ स्थान बदलने का नाम नहीं है; यह दिलों को छूने, मन को आजाद करने और यादें बनाने का जरिया है। चाहे वह पहाड़ों का खिंचाव हो, समुद्र की शांति हो, या यात्रा योजनाओं की चुनौतियाँ , यात्रा का असली आनंद उसके सफर में है।
तो, अपने बैग पैक करो—या कम से कम अपने सपनों को संभालो—और उस खूबसूरती को खोजने निकल पड़ो जो आपके इंतजार में है। याद रखो, जिंदगी भी एक सफर है, और हर पल एक नई खोज का मौका है। जिंदगी में यात्रा सबको करनी पड़ती है। कोई आध्यात्मिक यात्रा करता है तो कोई भौतिक यात्रा। मैं आज मेरे द्वारा की गई अर्बुद पर्वत की ऐतिहासिक यात्रा के बारे में अवगत करा रहा हूँ। जिसकी पटकथा कुछ ऐसे तैयार हुई।
स्वामी केशवानंद शिक्षण संस्थान ,लक्ष्मणगढ़, अलवर से राज्य स्तरीय स्काउट यूनिट लीडर एडवांस कोर्स के लिए हम तीन सदस्यों का चयन हुआ। जिसमें राम कुमार प्रजापति, लोकेश अवस्थी व जोगेन्द्र पाल जी का नाम था। यह सात दिवसीय शिविर माउंट आबू में लगना तय हुआ। इसकी सूचना जिला मुख्यालय अलवर से स्काउट सीओ राजेंद्र कुमार मीणा जी ने लिखित आदेश के रूप में प्रदान की। इस आदेश की पालना करते हुए हम 17 मई ,2025 को केशवानंद स्कूल लक्ष्मणगढ़ से माउंट आबू जाने के लिए तैयार हुए। संस्थान के निदेशक श्रीमान मोरध्वज सिंह चौधरी व स्थानीय संघ सचिव जमालुद्दीन खान जी ने हमारा स्वागत करते हुए रवानगी दी।हमने प्रातः 7:00 बजे बस स्टैंड लक्ष्मणगढ़ से जयपुर के लिए प्रस्थान किया। यात्रा का अपना अलग मिजाज और जुनून होता है, वह हमारे आचरण से झलक रहा था। बस अपने क्षेत्र की बस्तियों को छोड़ कर आगे बढ़ रही थी। रास्ता सीधा – सपाट तो कहीं खुरदरापन लिए हुए था। हम तीनों साथी अपने मन के उद्गार व्यक्त करते हुए लगभग 11 बजे जयपुर पहुँचे। यहाँ हमने विश्रामालय में बैठ कर भोजन किया। थोड़ा आराम करने के बाद हमने माउंट आबू जाने वाली बस की जानकारी हांसिल की। टिकिट की तो कोई चिंता नहीं थी। क्योंकि हम तीनों साथियों के पास निःशुल्क सफ़र का पास जो था। हम बस में बैठ गए। कुछ बातचीत करते हुए समय गुजरने लगा। बस रात्रि 12 : 00 बजे अजमेर, ब्यावर, सोजत,पाली,सिरोही के रास्ते आबू रोड़ पहुँची। उतर कर हमने यहाँ एक होटल पर रजवाड़ी चाय का आनंद लिया। जहाँ एक भाई साहब अपने अंदाज में चाय पिला रहा था। उसकी चाय बनाने की कला भी अनोखी थी । मैं उस पर विशेष गौर कर रहा था। फिर कुछ पूँछताछ की तो पता चला कि आबू पर्वत तो अभी आगे है। रात्रि में टैक्सी वाले किराया कुछ ज़्यादा लेते हैं। इस वजह से हमने सुबह चलने का निर्णय लिया। हम तीनों साथी यही केंद्रीय बस स्टैंड पर विश्राम करने लगे। थके होने के कारण नींद की झपकियाँ आने लगी। हम बारी बारी से कुछ सोते कुछ जागते रहे। रात्रि की निस्तब्धता चारों तरफ़ फैली थी। जिसे कुत्तों की भों भों की आवाजें बाधित कर रही थी। सवेरा होते ही मन को लुभाने वाले दृश्य दिखाई पड़े। मन करता इन्हें बार बार देखते ही रहें। देखकर ऐसा लगने लगा जैसे कोई जन्नत में आ गए हैं , लेकिन हमें ट्रेनिंग सेंटर पहुँचने की जल्दी थी इसलिए हम राजकीय बस में बैठकर आबू पर्वत के लिए रवाना हुए। ऊँची नीची पहाड़ियों को चीरती हुई बस सघन वनों से गुजरने लगी। तरह तरह की वनस्पतियों से आच्छादित पहाड़ सुंदर और मोहक लग रहे थे। रास्ते में करौंदे,आम,धौंक,बांस कनेर व फूलों वाले पोधों की भरमार थी। रास्ते एकदम जलेबी की तरह घुमावदार। नीचे हजारों फ़ीट गहरी खाइयाँ, सघन वृक्षों से आच्छादित वादियाँ मन में जरूर थोड़ा भय पैदा कर रही थी लेकिन मन का उत्साह उसे अंदर ही अंदर दबा रहा था। हम तीनों स्काउटर प्रातः 8 बजे आबू पर्वत पहुँचे। यहाँ के केंद्रीय बस स्टैंड से वापस लगभग 200 मीटर चलकर मधुवन होटल के पास एक मोड़ की तरफ घूमें। जहाँ स्काउट ट्रेनिंग सेंटर -1 का बोर्ड लगा हुआ है। पैदल चलकर हम अपने ट्रेनिंग सेंटर पहुँचे । अपना सामान एक तम्बू में रखा । दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर यूनिफॉर्म पहनी। अपने दस्तावेज लेकर मिलन सर्किल पहुँचे जहाँ रिपोर्टिंग हो रही थी। हमने अपनी रिपोर्टिंग कराई, यहीं पर दस्तावेजों की व यूनिफॉर्म की जाँच हुई,आवश्यक दिशा निर्देश दिए गए। इसके बाद हमने चाय नाश्ता लिया। इस तरह हमारे प्रथम दिवस के शिविर की शुरुआत हुई। सभी स्काउट्स को एक हॉल में एकत्रित करके 8 टोलियों में बाँटा गया। परिचय का दौर चला। हम एक दूसरे से परिचित हुए। इस शिविर का संचालन परबतसर ,अजमेर से आए विनोद दत्त जी जोशी कर रहे थे। सभी प्रकार की सुविधाएं स्थानीय सीओ जितेंद्र जी भाटी उपलब्ध करा रहे थे। प्रशिक्षक दल में भँवर सिंह जी भाटी, शैलेष जी पेलोड़, भँवर लाल जी हर्षवाल, बलराज जी व सुभाष जी पारीक मौजूद थे। इसके अलावा रॉवरिंग व कबिंग के प्रशिक्षक भी उपस्थित थे। मेरी टोली को हाथी टोली नाम मिला। जिसमें हम 9 सदस्य थे। सभी हँसमुख और व्यवहार कुशल थे। जगदीश जी मेघवाल तो ज्यादा ही विदूषक थे जो दिन भर तरोताजा रखते थे। दिनभर का समय स्काउट गतिविधियों से गुजरने लगा। सुबह पाँच बजे संगीत के साथ जागना ,दैनिक कार्यों से निवृत्त होना ,वीपी सिक्स में भाग लेना,व्यायाम करना, खेल खेलना, सेवा कार्य करना, नाश्ता करना,स्काउट ध्वजा रोहण करना, पाठ्यक्रम की कक्षाएं लेना, दोपहर का भोजन, भोजनोपरांत कक्षाएं, प्रायोगिक प्रोजेक्ट पूरे करते हुए चाय नाश्ते के साथ , रात्रि का भोजन और फिर कैम्प फायर। रात्रि 10:00 बजे शयन करना ये हमारी दैनिक व्यस्ततम गतिविधियाँ थी। जिन्हें देखकर हमें ऐसा लगता कि गतिविधियाँ ज्यादा हैं परन्तु समय कम हैं। शिविर के दूसरे दिन ही हमारे साथ एक वाकया घट गया। सभी अपने अपने टैंट में सो रहे थे। कोयल टोली के सदस्य पहरा दे रहे थे। रात्रि में शिविर स्थल के बीच भालू की हलचल दिखाई दी। जाग कर देखा तो एक मादा भालू अपने दो बच्चों के साथ अठखेलियाँ कर रही ही। कभी उन्हें पीठ पर बिठाती तो कभी दूध पिलाने लगती। कभी तम्बूओं के अंदर झाँक कर देखती। तम्बुओं के अंदर सोने वाले साँस रोककर ,दिल थाम कर, भयभीत अवस्था में मुर्दों की तरह लेटे थे। यह सब हम अपने तम्बुओं से देख रहे थे। मन ही मन अपने भाईयों के दर्द को महसूस कर रहे थे। अगले दिन यह भालू शिविर में दिनभर चर्चा का विषय रहा। शाम को हम सभी अपनी अपनी टोली के साथ नक्की झील पहुँचे। जहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय और मनोरम था। लोग नावों में बैठकर बोटिंग कर रहे थे। हजारों की भीड़ यहाँ मौजूद थी। कुल्फी वाले लोगों को लुभा लुभा कर अपना कारोबार चला रहे थे। यह राजस्थान की सबसे ऊँची मीठे पानी की मानव निर्मित झील है। इस पर टॉड रॉक और नन रॉक स्थित हैं। इस झील के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण देवताओं ने अपने नाखूनों से खोद कर किया था। यह लगभग 1200 मीटर की उँचाई प स्थित है जो लगभग 2.5 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली है । यहाँ हजारों की संख्या में पर्यटक घूमने आते हैं और झील की पवित्रता का लाभ उठाते हैं । इसे देखने के उपरांत सभी वापस शिविर में लौटे। इसके अगले दिन हमें हाईक के लिए भेजा गया , जो हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। हम अपनी टोली के साथ चिह्नों की खोज करते हुए स्काउट प्रशिक्षण केन्द्र 2 पर पहुँचे। यहाँ हमने अपना तम्बू बनाया । बिस्तर लगाकर आराम किया। यहीं पर हमने कम से कम बर्तनों में बढ़िया भोजन तैयार किया। सभी सदस्यों ने मिलकर बनाया और मिलकर खाया। हमारे द्वारा बनाए गए भोजन की सभी ने सराहना की। यहाँ हमने एक रात्रि विश्राम किया। दूसरे दिन हम प्रातःकाल होते ही गौमुख व महर्षि वशिष्ठ आश्रम की तरफ़ भ्रमण पर निकले। 730 सीढ़ियों के पहाड़ी ढ़लान व ख़ौफ़नाक घाटियों से गुजरते हुए हम गौमुख धाम पहुँचें । यह धाम आबू पर्वत बस स्टैंड से तीन किलोमीटर दक्षिण की तरफ सघन वन में स्थित है । यहाँ पवित्र पावनी सरस्वती गंगा अपनी अविरल गति से बह रही है। विश्वामित्र ऋषि के शाप का उद्धार करने के लिए वशिष्ठ ऋषि ने यहाँ सरस्वती को प्रकट किया था। यहाँ का पवित्र और निर्मल जल पी कर वशिष्ठ ऋषि का प्राचीन मंदिर देखा। यहाँ हमने वह हवन कुंड भी देखा जिसमें आहूति डालकर राजपूत वँश की उत्पत्ति की गई। महाभारत के प्रमाण अनुसार राजा दिलीप ने यहाँ 21 दिन नन्दिनी गाय की सेवा की थी। उसी के पुण्य से उन्हें रघु जैसे यशस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। राजा रघु के चौथे वंश में भगवान राम चन्द्र का जन्म हुआ। श्री राम के पूर्वज रघु जी वशिष्ठ जी को कुल गुरु बना कर अयोध्या यहीं से ले गए थे। यहीं पर प्राचीन काल का एक शिव मन्दिर भी बना हुआ है। यहाँ लगभग 700 साल पुरानी खण्डित मूर्तियाँ रखी हुई हैं जो वर्षों पहले भू स्खलन में क्षतिग्रस्त हो गई थी। यहाँ की शोभा अनुपम है। इसे देखने के बाद हम सभी साथी वापस अपने कैंप में आए।दोपहर बाद हम फिर गाड़ियों में बैठकर ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण पर निकले। हमने देलवाड़ा का जैन मंदिर देखा,जो अपनी कलात्मकता की दृष्टि से अद्वितीय बना हुआ है। सफेद रंग के पत्थरों से इसे बनाया गया है। इसकी नक्काशी देखते ही बनती है। जितने भी पत्थर लगाए गए हैं , उन्हें मूर्ति के आकार में ढाला गया है।फिर मन्दिर का आकार दिया गया है। इस मंदिर की भव्यता को अपने अन्तस् में समेटते हुए हम अचलगढ़ के ऐतिहासिक दुर्ग पर पहुँचे। यहाँ भी अचलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर बना हुआ है।
यहाँ के पुजारी ने हमें बताया कि यहाँ भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। हमने उसके भी दर्शन किए। मन्दिर के पिछले हिस्से में दो भैंसों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं । जहाँ लोग अपने फ़ोटो खिंचाने में मस्त रहते हैं । मन में आद्यात्मिक भावों की सरिता सी बहने लगी। कण्ठ से संगीतमयी स्वर प्रस्फुटित होने लगे । हमने इससे थोड़ी आगे ब्रह्माकुमारी शांति पार्क का भी भ्रमण किया।इसका सौंदर्य मन को सचमुच शांति प्रदान करने वाला था। रंग बिरंगे फूलों वाले पौधें मन मोहक लगते हैं। पार्क की साफ सफाई और व्यवस्था सुंदर ढंग से नियोजित की गई है। यहाँ भी कई चीजें स्मृतियों में बसाने योग्य हैं । इससे भी आगे हम पहाड़ की ऊंचाइयों को मापते हुए गुरु शिखर पर पहुँचे।यह राजस्थान की सबसे ऊँची चोटी होने का गौरव रखती है। यहाँ के कुछ छायाचित्र अपने कैमरे में कैद कर हम वापस नीचे उतरे। यहाँ हमने महर्षि दत्तात्रेय के प्राचीन मंदिर को देखा,जो पहाड़ की चट्टानों को काटकर बनाया गया है। गुरुशिखर से लौटकर हम अर्बुदादेवी के मंदिर पहुँचे। यहाँ भी हमें पहाड़ी सीढ़ियों से गुजरना पड़ा। अर्बुदादेवी मन्दिर के रास्ते में हमने कई प्रकार के जंगली जीवों को देखा। जो भोजन की तलाश में शायद सीढ़ियों के पास आ गए थे।यहाँ शैलानियों का मुख्य आकर्षण भालू थे।जो अपने बच्चों के साथ अठखेलियाँ करते घूम रहे थे। हमने यहाँ अर्बुदादेवी के मंदिर की परिक्रमा की और वापस शिविर में लौट कर आ गए। इस तरह की यात्राओं और अपने पाठ्यक्रम की गतिविधियों को पूरा करते हुए हमें आनंद की अनुभूति हो रही थी। अपने गुरुजनों का स्नेह और प्यार हमें दुगुने उत्साह से सींच रहा था। दिन भर की व्यस्तता को हम कैम्प फायर में नाच कूद कर दूर करते । इस तरह हमें पता ही नहीं चला कि कैसे सात दिन का वक्त गुजर गया। हम शिविर की गतिविधियों में इतने खो गए कि घर की याद ही नहीं आई। शिविर के अंतिम दिन जब हम सभी साथी एक दूसरे से जुदा होकर चलने लगे तब सब की आँखें नम हो गई। बिछड़ने का मन नहीं कर रहा था परंतु मजबूरीवश जाना पड़ रहा था। हमें विदा करते वक्त सभी प्रशिक्षकों की आँखों में आँसू छलक आए थे। जोशी जी तो कुछ ज्यादा ही भावुक हो रहे थे। हर्षवाल जी और पेलोड़ जी तो बार बार अपने ओठों को भींच कर पीड़ा को दबाने का प्रयास कर रहे थे । बलराज जी और सुभाष जी का चेहरा मायूस होता जा रहा था। जिन्हें देखकर मेरे तमाम साथियों के चेहरों पर उदासी झलक रही थी। हम महसूस कर रहे थे कि बिछुड़ने की पीड़ा कितनी करुणोत्पादक होती है ? इन सबके बीच हमें एक नई ऊर्जा और खुशी का एहसास भी हो रहा था। हमने यहाँ से जो ज्ञान सीखा है । वह हमारे आजीवन साथ रहेगा । हम एक दूसरे से जुदा होकर भी आजीवन निकट बने रहेंगे। इस तरह माउंट आबू (अर्बुद पर्वत) की यह यात्रा जीवन में अविस्मरणीय रहेगी।
याद बहुत आएंगे , मीठी बातों वाले दिन।
ऊमस भरी गर्मी में, ठंडी रातों वाले दिन।
बुलाती रह गई हँसती , मुस्काती वादियाँ।
याद बहुत आएँगे,ये मुलाकातों वाले दिन।
राम कुमार प्रजापति
लक्ष्मणगढ़, अलवर




