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अरे क्यों….

अरे क्यों….
अरे क्या मिला होगा केतन की भावनाओं से खेल कर तुझे चेतन?
भला ऐसा कोई करता है, किसी का कत्ल करके बसाता अपना निकेतन?
अरे क्यों नहीं काँपी तेरी रुह सिया गोयल?
क्या तू इतनी भी नहीं थी लॉयल?
क्या आत्मा तेरी भी थी अवचेतन ?
क्यों रचा था झूठा स्वांग? क्या केतन बोला था कुछ कड़वे बोल,
क्यों रखा था केतन की भावनाओं को भ्रम में, और इस जग से किया ओझल ?
क्यों नहीं समझी जीवन के मोल
क्यों नहीं जानी सिया मनुष्य के भाव है अनमोल ।
स्वरचित: अशोक दोशी “दिवाकर’




