जानकीवल्लभ शास्त्रीजी और निराला जी का आपसी प्रेम

(अवध किशोर मिश्र)
जब भी पंडित जानकीवल्लभ शास्त्रीजी के मुजफ्फरपुर स्थित मकान का नाम ‘निराला निकेतन ‘ पढ़ता हूँ तो एक विचार से अत्यंत विस्मय से भर उठता हूँ –
‘अपने समय का युवा कवि जो बिहार उड़ीसा का टाॅपर रहा हो.. स्वर्ण पदक विजेता रहा हो उस पर एक फक्कड़ किस्म के कवि का क्या प्रभाव पड़ा होगा कि वह अपनी कमाई से बुढ़ापे में बनाए गए मकान का नाम अपना या अपनी पत्नी का या अपने पूर्वजों का नाम न देकर ‘निराला निकेतन’ रखने की मजबूरी आन पड़ी हो.
लेकिन नहीं! ऐसा तब ही संभव होता है जब कोई अपने जीवन का आदर्श… पथप्रदर्शक.. गुरु किसी को मान लेता है.
आखिर क्या चीज होगी जो ‘ शास्त्रीजी ‘जी को ‘निराला’के निकट खींचता रहा होगा?
मुझे लगता है कि जानकीवल्लभ जी ने जब ‘निराला: जी की कविता
‘वह तोड़ती पत्थर!
इलाहाबाद के पथ पर… ‘
या
भिक्षुक’ कविता की पंक्तियाँ
-वह आता –
दो टूक कलेजे को करता पछताता…. ‘
पढ़ी होगी तो सहज ही उनके मानस पटल पर अपने पारिवारिक दैन्यता के दंश को झेलकर काशी विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या विभाग के चार छात्रो के रहने वाले चार चौकियों वाले ‘रुइया छात्रावास ‘में रहने वाले अट्ठारह- उन्नीस वर्षीय दुबले पतले छात्र जानकीवल्लभ से जब एक मंझोले कद, गठीले वदन के कुंदन के समान वर्ण वाले “निराला’ मिले होंगे तभी उनके जीवन में लगा होगा –
” बिच्छू की दंश वाली संस्कृति, भुजंग की चाल सी राजनीति राजनीति, और विष भरी साहित्यिक बेल के बीच स्वयंभू शिवशंकर की तरह अकेला शिवशंकर की तरह तत्कालीन साहित्याकाश में गगन भेदी दहाड़ लगाने वाला यह कवि निश्चित ही
-उमड़ घुमड़कर
, व्यर्थ गर्जन-तर्जन कर आकाश में आवारा बन मंडराने वाले बादल..
नीचे आ रे बादल!..’ से ही सीखा होगा ‘ बादल- राग’ गाना.
मुझे तो लगता है जैसे ‘निराला’ जी को ‘पंत’ जी जैसे मधुर मोहक बादल कभी प्यारे नही लगे वे दहाड़ने वाले बादल को ही अपना प्रेय और श्रेय दोनों मानते रहे हैं..
वैसे ही जानकीवल्लभ शास्त्री जी को भी ‘बादल राग “की भांति ‘मेघगीत’ अत्यधिक प्रिय रहा.
तभी तो समाज पर कुंडली मारी राजनीति को लक्ष्य कर’ ‘मेघगीत’ में यह गुरु गंभीर हुंकार करने से अपने को रोक नहीं सके –
‘मेघगीत ‘ की कुछ पंक्तियों
–
“ताड़ खड़खड़ाते हैं केवल चील- गीत ही गाते
द्रवित दाह भी थम जाता है धरती तक आते आते
जनता धरती पर बैठी है नभ में मंच खड़ा है
जो है जितना दूर मही से उतना वही बड़ा है”
× × × ×
“ऊपर ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले हैं
कहते हैं -ऐसे ही जीते हैं जो जीने वाले हैं”
“मेघगीत” की ये पंक्तियाँ बहुत ही अर्थपूर्ण और प्रतीकात्मक हैं।
– “ताड़ खड़खड़ाते हैं केवल चील- गीत ही गाते” – यहाँ ताड़ के पेड़ों की आवाज़ और चील की आवाज़ का वर्णन है, जो शायद एक उदास और शांत वातावरण को दर्शाता है।
– “द्रवित दाह भी थम जाता है” – यहाँ “द्रवित दाह” शब्द का अर्थ है जलन या पीड़ा का शमन होना। यह पंक्ति शायद यह दर्शाती है कि मेघ की वर्षा से जीवन की कठिनाइयाँ और पीड़ाएँ शांत हो जाती हैं।
– “धरती तक आते आते जनता धरती पर बैठी है नभ में मंच खड़ा है” – यहाँ जनता की प्रतीक्षा और मेघ की वर्षा के लिए उनकी तैयारी का वर्णन है। नभ में मंच खड़ा होने का अर्थ हो सकता है कि आकाश में बादलों का जमावड़ा हो रहा है।
– “जो है जितना दूर मही से उतना वही बड़ा है” – यह पंक्ति शायद यह दर्शाती है कि जो चीजें हमारे से दूर होती हैं, वे हमें बड़ी और रहस्यमयी लगती हैं।
– “ऊपर ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले हैं” – यहाँ शायद यह दर्शाया गया है कि जो लोग सक्षम हैं वे अपने हिस्से का आनंद लेते हैं और बाकी लोगों के लिए कुछ नहीं छोड़ते हैं।
– “कहते हैं -ऐसे ही जीते हैं जो जीने वाले हैं” – यह पंक्ति शायद यह दर्शाती है कि जो लोग जीवन को पूरी तरह से जीते हैं, वे ही जीवन का सच्चा अर्थ समझते हैं।
इन पंक्तियों में राज नेताओं की आम जनता के प्रति जो सोच रही है वही जीवन, प्रकृति, और समाज के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
शास्त्रीजी के “मेघ गीत” और निराला जी की रचनाओं के विषयों के तारतम्य को समझने के लिए, हमें दोनों कवियों की कविताओं का विश्लेषण करना होगा।
निराला जी की कविताओं में अक्सर प्रकृति के सौंदर्य और मानव जीवन की जटिलताओं का वर्णन मिलता है। उनकी कविता “बादल राग” में बादलों के सौंदर्य और उनकी शक्ति का वर्णन है, जो शास्त्रीजी के “मेघ गीत” में भी देखा जा सकता है।
निराला जी की कविता “बादल राग” में
“बादल राग में गाता है,
मेघों का समूह गाता है,
वर्षा की धारा बहती है,
जीवन की धारा बहती है।”
शास्त्रीजी के “मेघ गीत” में भी बादलों और वर्षा का वर्णन है, जो जीवन की धारा को आगे बढ़ाने का प्रतीक है। शास्त्रीजी की कविता “मेघ गीत” में
“मेघों के गीत गाते हैं,
वर्षा की धारा बहती है,
जीवन की धारा आगे बढ़ती है,
नई आशाओं के साथ।”
दोनों कवियों की कविताओं में प्रकृति के सौंदर्य और जीवन की जटिलताओं का वर्णन है, जो उनके तारतम्य को दर्शाता है। दोनों कवियों ने अपनी कविताओं में जीवन की धारा को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति की शक्ति का उपयोग किया है।
इसके अलावा, दोनों कवियों की कविताओं में एक गहरा भावनात्मक स्तर भी है, जो पाठकों को आकर्षित करता है। निराला जी की कविताओं में अक्सर जीवन की विसंगतियों और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई गई है, जबकि शास्त्रीजी की कविताओं में जीवन की धारा को आगे बढ़ाने के लिए आशा और विश्वास का संदेश दिया गया है।
इस प्रकार, शास्त्रीजी के “मेघ गीत” और निराला जी की रचनाओं के विषयों के तारतम्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि दोनों कवियों ने अपनी कविताओं में जीवन की जटिलताओं और प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन किया है, जो उनके तारतम्य को दर्शाता है।
जानकीवल्लभ शास्त्री जी का निराला जी के प्रति प्रेम और साहित्यिक आत्मीयता
हिंदी साहित्य के इतिहास में कई महान कवि और लेखक हुए हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं से समाज को नई दिशा देने का काम किया है। ऐसे ही दो महान व्यक्तित्व हैं सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और जानकीवल्लभ शास्त्री। निराला जी जहां अपनी अद्वितीय काव्य शैली और प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते हैं, वहीं जानकीवल्लभ शास्त्री जी एक उत्कृष्ट कवि और आलोचक के रूप में हिंदी साहित्य में अपनी विशेष पहचान बना चुके हैं। यहाँ मे जानकीवल्लभ शास्त्री जी के निराला जी के प्रति प्रेम और साहित्यिक आत्मीयता का विश्लेषण करना चाहूँगा-
निराला जी के साथ जानकीवल्लभ शास्त्री जी का संबंध
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जानकीवल्लभ शास्त्री जी और निराला जी के बीच का संबंध गुरु-शिष्य के रूप में था। शास्त्री जी ने निराला जी को अपना गुरु माना और उनकी रचनाओं से प्रभावित हुए। निराला जी की कविताओं में जीवन के विभिन्न पहलुओं का चित्रण है, जिसमें प्रेम, करुणा, और सामाजिक न्याय की भावना प्रमुख है। शास्त्री जी ने निराला जी की कविताओं का गहन अध्ययन किया और उनके विचारों को आत्मसात किया।
निराला जी के प्रति शास्त्री जी का प्रेम
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जानकीवल्लभ शास्त्री जी ने निराला जी के प्रति अपने प्रेम और सम्मान को कई बार व्यक्त किया है। उन्होंने निराला जी की कविताओं की प्रशंसा की और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। शास्त्री जी की रचनाओं में भी निराला जी के प्रभाव को देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी कविताओं में निराला जी की तरह ही जीवन के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया है और सामाजिक न्याय की भावना को प्रमुखता से उठाया है।
साहित्यिक आत्मीयता
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जानकीवल्लभ शास्त्री जी और निराला जी के बीच की साहित्यिक आत्मीयता उनके पत्रों में भी देखी जा सकती है। शास्त्री जी ने निराला जी को कई पत्र लिखे, जिनमें उन्होंने अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त किया है। निराला जी ने भी शास्त्री जी को पत्र लिखकर अपने विचारों और भावनाओं को साझा किया है। इन पत्रों से हमें दोनों महान कवियों के बीच के गहरे संबंध का पता चलता है।
जानकीवल्लभ शास्त्री जी का निराला जी के प्रति प्रेम और साहित्यिक आत्मीयता एक महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर शोध करने से हमें हिंदी साहित्य के इतिहास में एक नए दृष्टिकोण को समझने का अवसर मिलता है। शास्त्री जी की रचनाओं में निराला जी के प्रभाव को देखकर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने गुरु की विचारधारा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। इस शोधपत्र के माध्यम से हमने जानकीवल्लभ शास्त्री जी और निराला जी के बीच के संबंधों का विश्लेषण किया है और उनकी साहित्यिक आत्मीयता को समझने का प्रयास किया है।
क. जानकीवल्लभ शास्त्री जी और निराला जी के बीच के संबंधों पर और अधिक शोध करने की आवश्यकता है।
ख. उनकी रचनाओं का गहन अध्ययन करके उनके विचारों और भावनाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए।
ग. हिंदी साहित्य के छात्रों को जानकीवल्लभ शास्त्री जी और निराला जी की रचनाओं से परिचित कराना चाहिए, ताकि वे उनके बारे मे समझ सकें




