आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राबड़ी प्रसाद की जयंती के अवसर पर मंडलीय मुख्यालय सारण के शहर में स्थित यह अतिप्रतिष्ठित जिला स्कूल हमें न केवल इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि यह भी बताता है कि अगर आज पहली नहीं हुई तो आने वाली पीढ़ियां उस विरासत को खो देंगी, जिस पर नजर ही नहीं, बल्कि पूरा बिहार और देश का गौरव है। लेकिन आज जरूरत है कि सिर्फ भाषणबाजी से नहीं बल्कि उन खलिहानों को संवारने की जरूरत है, रैना नेशनल निर्माण के उद्देश्य हैं। देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती (03 दिसंबर) को जहां पूरे देश में उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है, वहीं बिहार के ऐतिहासिक जिला स्कूल, जहां राष्ट्रपति के प्रथम राष्ट्रपति के छात्र जीवन का गौरवशाली समाज माना जाता है। आज अज़ाब्दी, अज़ादी और डिवीज़न डिविज़न के कारण उनकी पहचान पुराने के अवशेषों पर है। कभी-कभी जहां शिक्षा की उत्कृष्टता का उजाला था, वहीं आज मस्जिद भवन, अव्यवस्थित संसाधन और उद्यम व्यवसाय का अंधियारा हावी है।
ऐतिहासिक विरासत, लेकिन वर्तमान में पुरावशेष
वर्ष 1893 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसी जिला स्कूल में आठवीं कक्षा में प्रवेश लिया था। इन्हीं से उनकी प्रतिभा भरी थी, जिसके बाद उन्हें पूरे देश का गौरव प्राप्त हुआ। 1902 में इसी विद्यालय से प्रवेश परीक्षा (इंट्रेंस) जारी करके उन्होंने बिहार- उड़ीसा, बंगाल, असम, बर्मा और नेपाल तक में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। अंग्रेज़ परीक्षक की ऐतिहासिक टिप्पणी “परीक्षा परीक्षक से बेहतर है” आज भी इस स्कूल के स्वर्णिम अतीत की खीरा मणि जाती है। लेकिन समस्या यह है कि उनकी वही उत्तर पुस्तिका आज कोलकाता से बिहार तक नहीं जा सकी है। लगभग 122 वर्षों में ना जाने कौन सा जादू चला गया, लेकिन वह मूल्य अध्ययन पहली बार तक वापस नहीं आया।
देशरत्न की वर्तमान जयंती के अवसर पर जब भी हर साल इस विद्यालय का इतिहास याद आता है, तब विद्यालय की स्थिति स्वयं प्रश्न पूछती है। विद्यालय के विद्यार्थियों में कई स्मारक जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। कई साज़िशों की छतें खंडहर हो गई हैं। विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय, पुस्तकालय और खेल का प्रबंधन नहीं है।
हालांकि परिसर में ‘राजेंद्र वाटिका’ और एक पार्क मौजूद है, लेकिन उस स्तर की झलक नहीं है, इस ऐतिहासिक स्मारक से जुड़ा क्षेत्र मौजूद है। जिला स्कूल की सनामी की सबसे बड़ी वजह खुद शिक्षा विभाग का खुलासा है। स्कूल के विशाल परिसर के कई कमरों में शिक्षा विभाग ने अपने छात्रावासों पर कब्जा कर रखा है, जिनमें स्थापना शाखा, सर्व शिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन (एमडीएम) कार्यालय आदि शामिल हैं।
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यहां के शिक्षक बताते हैं कि जिला स्कूल को मॉडल स्कूल का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। यहां हर कोने में राजेंद्र बाबू की यादें बसती हैं, मगर आज यहां उनका माहौल नहीं है जो इस हवेली को मिलना चाहिए। स्कूल में इंटरनैशनल के समकक्ष कृषि विषय के लिए दो साल का कोर्स संचालित होता है, लेकिन शिक्षक पद की स्थापना नहीं होने के कारण लैब टेक्निशियन के पढ़ाई की पढ़ाई चल रही है। एनसीसी इकाई और कंप्यूटर सोसायटी की स्थापना से थोड़ी आधुनिकता है, लेकिन परमाणु ऊर्जा संयंत्र की कमी और वित्तीय संस्थान की स्थापना में इन प्रावधानों का लाभ सीमित है। हालाँकि यह स्कूल सिर्फ एक स्कूल नहीं बल्कि डॉ. है। राजेंद्र प्रसाद की शिक्षा यात्रा का प्रतीक है।
हर वर्ष जयंती पर जब विद्यालय की गौरवगाथा को याद किया जाता है, तो छात्र-छात्राओं में प्रेरणा उत्पन्न होती है। लेकिन यह भी देख रहे हैं कि जिस खड़ियाघर पर शहर और पूरा देश गौरव करता है, वही सरकारी दर्शक पर्यटकों से बह रहे हैं।
सरकार की ओर से विस्तृत प्रश्न
यह अत्यंत भिन्न रूप है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान व्यक्तित्व के नाम पर वोट तो खूब मिलते हैं, लेकिन उनका मूल्य शिक्षा रियाल को उखाड़ने और विकसित करने की शुरुआत में कोई नहीं देता। क्योंकि ना तो भवन के संरक्षण पर ध्यान दिया गया है, और ना ही परिसर को स्मारक के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है। इतना ही नहीं बल्कि उनके ऐतिहासिक उत्तर पुस्तिका की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया, अगर रखा गया तो सूखा खलिहान बिहार में रहा। यह राष्ट्रनिर्माण की विरासत की प्रति अनदेखी नहीं है तो फिर क्या है। सरकार की नजर में स्कूल में यह सिर्फ एक इमारत है, इतिहास नहीं है।