कहानियां जो पीछे छूट गई” पुस्तक की समीक्षा कवियत्री डॉ पूर्णिमा पाण्डेय “पूर्णा”जी द्वारा

श्री विश्वनाथ पाण्डेय जी” द्वारा लिखित कहानी संग्रह “कहानियां जो पीछे छूट गई” पुस्तक की समीक्षा कवियत्री डॉ पूर्णिमा पाण्डेय “पूर्णा”जी द्वारा
——————————————————————–
आदरणीय विश्वनाथ पांडेय जी की कहानी संग्रह “कहानियां जो पीछे छूट गई ” की समीक्षा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह पुस्तक लोकरंजन प्रकाशन से प्रकाशित है। यह कहानी संग्रह “कहानी जो पीछे छूट गई” आपका नवीनतम प्रयास है।यह कहानी संग्रह आपने अपने माता पिता को समर्पित किया है जिनके संस्कार, स्नेह और आशीर्वाद ने लेखक के विचारों को दिशा दी, कलम को भाव दिया और जीवन को अर्थ ।
“कहानियां जो पीछे छूट गई” कीK कहानियों का लेखन सरल एवं प्रभावी है जो पाठक के मन पर छाप छोड़ देता है । अति आकर्षक, मनमोहक, मोहित करता मुख पृष्ठ, सुंदर रंगो से परिपूरित है ।
यह कहानी संग्रह आठ कहानियों में पिरोया गया है । इसमे श्वेत श्याम तस्वीरे है यह तस्वीरे हमे लोगो के जीवन के बारे में बेहतर जानकारी देती हैं।
परछाइयों के पार- इस कहानी में नायक यशवीर की रहस्यमयी और राष्ट्र सेवी कथा का वर्णन बहुत सुंदर ढंग से किया गया है ..”जल्द ही एक चुनौती सामने आई एक संवेदनशील कार्य जो महीनो से अनसुलझा पड़ा था इस काम को यशवीर ने कर दिखाया” ..बहुत सुंदर कहानी है।
मन की यात्रा- मन की यात्रा कहानी बहुत रोचक है यह आध्यात्मिक खोज और आत्म विकास की अंतर्मुखी यात्रा है ।
शोध चलता रहा गोष्ठी चलती रही – बनारस शहर के नवाबगंज की गलियों के लोगों पर लिखी शानदार कहानी है।
वैद्य जी की संस्कृत पाठशाला – ” वैद्य जी के नाम में ही जैसे कोई मंत्र था उनकी आंखों में शांति थी और बातों में ऐसी मिठास जो रोगी के मन को पहले ही ठीक कर देती थी” बहुत सुंदर वर्णन …संस्कार सेवा और परंपरा के उजाले प्रतिबिंब को दर्शाती मनभावन कहानी।
सूटकेस की अदला बदली- यह कहानी हास्यरस से भरी है
सूटकेस की अदला बदली एक अप्रत्याशित घटना पर लिखी है..”ताला खुल ही नही रहा था घबराहट में उसने पर्स से डुप्लीकेट चाबी निकाली मगर नतीजा वही रहा…ताला जैसे ज़िद पकड़ कर बैठ गया।
सूटकेस की अदला बदली कहानी का सुखद अंत है पढिये बहुत मजा आएगा कहानी पढ़ने में।
गुलाबी कहर – दो हज़ार के नोट की गाथा एक आम भारतीय की जद्दोजहद को दर्शाया है ..”उसे पहली बार एहसास हुआ की दो हज़ार का नोट सिर्फ गुलाबी नहीं गुलामी की निशानी हो सकता है।”
बनियान – बहुत सुंदर . विज्ञापन संस्कृति पर व्यंग्य करती कहानी है।
बावन बीघा पुदीना – बहुत रोचक कहानी ..” वह फैक्ट्री में सहयोगियों से बोलते की गांव में उनके पास भारी जायदाद है और बावन बीघे में केवल पुदीने की ही खेती होती है उनकी बात पर कोई यकीन नहीं करता”
आ. विश्वनाथ पाण्डेय (दादा) जी प्रत्येक कहानी किसी न किसी मनोभाव को छूती है। आपकी कहानियां समाज की हकीकतों से रूबरू कराती है। यह कहानी संग्रह पाठकों के दिलों को छूने और उन्हें सोचने पर मजबूर करने वाला है।
मैं आपके इस सुंदर कहानी संग्रह के लिए अनंत शुभकामनाएं प्रेषित करती हूँ। ईश्वर से कामना करती हूँ कि आपकी यह साहित्यिक यात्रा निर्विघ्न अनवरत चलती रहे।
डॉ पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा”‘
प्रयागराज



