हिंदी हेतु संकल्प

हिन्दी पखवाड़े पर विशेष संकल्प
गजानन महाराज की नगरी सिहोर मे आज हिन्दी दिवस के पावन पर्व पर 22 प्रान्तों से आयें हुयें हमारे वरिष्ठ व कनिष्ठ सरस्वती उपासकों द्वारा हिन्दी भाषा के विकास की जो अविरत गंगा बह रही है, यह अपने आप मे भव्य व दिव्य हैं।
म प्र साहित्य साधना मंच, सिहोर राष्ट्रीय कवि परिषद् भारत का यह प्रयास जरूर ही एक निश्चित रूप से अपनी हिन्दी भाषा को स्थापित करने के लिए मील का पत्थर साबित होगा। इसके साथ-साथ भोपाल म.प्र में स्थापित साहित्यिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट आयोजित कार्यक्रम इसमें चार चाँद लगा देते हैं।
भोपाल का हिन्दी भवन,रवीन्द्र भवन,गांधी भवन,मानस भवन यें सब हिन्दी को स्थापित करने के लिए आधार स्तम्भ है। यहां वर्ष भर कार्यक्रम आयोजित होना इस बात का प्रमाण है कि हम अपनी राष्ट्र भाषा को उसका सही दर्जा दिला कर ही दम लेंगे।
साहित्य समाज का दर्पण है तो साहित्य समाज के साथ चलने वाली मशाल भी हैं।
हम अपनी हिन्दी भाषा को अपनी असली पहचान दिला सकें व आज की युवा पीढ़ी को इसके लिए तैयार करना हमारे लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि आज हिन्दी भाषा राज्य भाषा होने के बावजूद भी अंग्रेजी भाषा के नीचे दबती जा रही हैं।
यह सोचनीय प्रश्न है।
पहले हमारे ऊपर अगे’जो ने हुकूमत की अब अगे’जी भाषा का दबदबा है। इन हालातों से समय रहते भारतवासी नहीं जागे तो हिन्दुस्तान की आत्मा हिन्दी का खात्मा होंने में देर नहीं लगेगी।
हिन्दी भाषा हमारी पहचान है,हमारी संस्कृति हैं,हमारे संस्कार हैं और हमारा अस्तित्व ।
इसे संवारना,सजाना व इसकी सुरक्षा का दायित्व भी हमारा ही है।
हमें सबसे पहले अपने आप को परिपक्वता देनी होगी इसके साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं का भी ध्यान रखना जरूरी है।
जब तक हम पूर्णरूपेण समर्पित नही होंगे सफलता मिलना मुश्किल होगा।
समर्पण भाव व विश्वास की अखंडता एक मजबूत और संस्कारित समाज की रचना करती है।
इतना कहूँगी कि पवित्र मन की उर्वरा भूमि पर जब शुभ विचारों का बीज अंकुरित होता है, तों धीरे-धीरे वह एक विशाल वट वृक्ष बन जाता है। और यह शुभ विचार हमें ईश्वर की कृपा से प्राप्त होते है।
जो हमारे देश की उन्नति व प्रगति में सहायक होता है।
हमें तोता नहीं बनना है, जो बोलता तों बहुत हैं, पर ऊंचा उड नहीं सकता। हमें वाज की तरह बनना है,वाज चुप रहता है और आसमान छू कर दिखा देता है।
हिन्दी हमारी माँ हैं,जब बच्चा पैदा होता है,तों सबसे पहले उसके मुंह से माँ शब्द ही निकलता है। वह अपने भावों को विचारों को अपनी भाषा में ही प्रकट करता है। लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता है,उसके ऊपर अगे’जी का डण्डा चलने लगता है। उसके भाव तों मातृभाषा में ही रहेंगे पर प्रस्तुति अगे’जी में करना है।इसलिए वह अपने भावों को पूर्णरूप से रखनें में असमर्थ रहता है,इसलिए वह जिस ऊचाई पर पहुंच सकता है उससे वंचित रह जाता हैं।
क्योंकि वह अपनी जमीन से नहीं जुड़ पाया,अपनी मातृभूमि से दूर हो गया।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है इसमें प्यार की महक,स्नेह की लोरी गीतों का सरगम व माॅ के गोद की गरमाहट समाई हुई हैं। जो हमें नवजीवन प्रदान करने के साथ-साथ हमारे विकास में सहायक बनती है।
इसी में घर,परिवार,समाज व देश का हित समाया हुआ है।
तों हमें संकल्प लेना होगा कि हम अपनी हिन्दी भाषा को
सिरमोर बना कर ही दम लेंगे।
रचनाकार -राजकुमारी चौकसे प्रेरणा
भोपाल म.प्र
हिन्दी प्रचार -प्रसार समिति भोपाल




