गीत वो जो मैंने लिखे ही नहीं

“गीत वो जो मैंने लिखे ही नहीं ”
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गीत वो जो मैंने लिखे ही नहीं,
भाव मन को दिये उसने उपहार मे
प्यार का रंग ऐसा चढ़ाया कि बस
तन से मन से रंगी उसकी मनुहार मे ।
दिल को मेरे अचानक ये क्या हो गया,
रम गई उसमें मैं साधिका की तरह,
अब वो लगने लगा मेरा कान्हा मुझे,
हो गई उसकी मै राधिका की तरह ।
इससे पहले ये मालूम मुझको न था,
दिल ये ऐसे भी खोता है क्या प्यार मे?
गीत वो जो कि मैंने लिखे ही नहीं,
भाव मन को दिये उसने उपहार मे।
मेरे मन में उभरते हैं जज्बात जो,
गीत की शक्ल में बोल उसने दिये,
छोड़ बैठी थी जिनकी मैं अब कल्पना,
पल वो खुशियों के अनमोल उसने दिये ।
थामकर हाथ मेरा उबारा मुझे,
डूब जाती नहीं तो मैं मझधार में,
गीत वो जो कि मैंने लिखे ही नहीं,
भाव मन को दिये उसने उपहार मे ।
स्वप्न मे भी न सोचा था मैंने कभी,
मेरे सीने की धड़कन वो बन जायेगा,
मेरा जीवन जो बंजर सा था हो चला,
इक सुवासित सा उपवन वो बन जायेगा ।
पोछकर अश्रु दी कुछ खुशी इस तरह,
मन लगाने लगी रूप श्रृंगार मे,
गीत वो जो कि मैंने लिखे ही नहीं,
भाव मन को दिये उसने उपहार मे ।
डॉ. अंजना सिन्हा ” सखी ”
रायगढ़, छत्तीसगढ़




