साहित्य की साधना है जिसके जीवन का उद्देश – प्रिया पाण्डेय ‘रोशनी’

जब देश कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा था, तब इन्होंने कलम और डायरी को अपना मित्र बनाया और अपनी पहली कविता “अबकी होली घर जाना हैं” लिख डाला जो कि पश्चिम बंगाल के समाज्ञा अखबार में प्रकाशित हुई थी और इस प्रकार से प्रिया जी ने अपने साहित्य को एक नई रोशनी दी और साहित्य की दुनिया में अपना पहला कदम रखा।
प्रिया पाण्डेय “रोशनी” का जन्म 22 अक्टूबर 1999 को उत्तरप्रदेश में हुआ। उनके पिता का नाम स्वर्गीय राजकुमार पाण्डेय हैं। उनके पिता का देहांत मात्र जब वो दो साल की थी तभी करेंट लगने हो गई थी। इनका पालन – पोषण उनके बड़े माता – पिता ने किया और उनकी पूरी शिक्षा एवं विवाह उनके बड़े माता – पिता ने ही करवाया |
प्रिया पाण्डेय ने बी. ए., एम.ए., बी.एड तथा पी. जी. डी. सी. ए. की उपाधियां प्राप्त की हैं, वो पश्चिम बंगाल के उत्तरपाड़ा यूनियन गर्ल्स हाई स्कूल में राजनीति शास्त्र की शिक्षिका के रूप में कार्यरत रह चुकी हैं और एक कुशल लेखिका एवं संपादिका के रूप में इन्होंने अपनी कुशलता को निखारा है।
इनकी प्रकाशित पुस्तकें दहेज़ एक श्राप, तेरी मेरी कहानी, दिल के जज़्बात, पिता का साया, साझा संग्रह काव्यांचल, समकालीन साहित्य में किन्नर विमर्श, रक्षा बंधन इत्यादि कई सारी पुस्तकों में इनकी रचनाएं प्रकाशित हैं ।
संपादित पुस्तकें मां मान बेटी सम्मान, ईश्वर ही प्रेम हैं, अभव्या एक रोशनी जैसी पुस्तकों का कुशल प्रकाशन।
कई सारे मंचों पर अपनी कविताओं का पाठ किया इन्होंने हिंदी मेला में नाटक प्रस्तुति किया है | कई सारे ऑनलाइन संगोष्ठी में भाग लिया।
इन्हें सर्वश्रेष्ठ बेटी सम्मान -२०२० , सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका सम्मान -२०२१, सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान, भोजपुरी साहित्य विकास मंच सम्मान इत्यादि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया हैं ।
वर्तमान में वो अपनी रचनाओं द्वारा हर स्त्रियों के लिए शसक्त बन ने का कार्य कर रही हैं,और अपनी रचनाओं से हर युवाओं को प्रेरणा दे रहीं हैं ।



