आधुनिकता की भागदौड़ में मानव चेतना संवेदनहीन हो गई है

(एक गहरा तथा प्रेरणादायक सन्देश)
आधुनिकता की भागदौड़ में मानव चेतना इतनी संवेदनहीन हो गई है कि वह एक कवि की सूक्ष्म अनुभूतियों या साधारण मनुष्य की सहज गरिमा के प्रति पूरी तरह उदासीन है। मनुष्यता का वास्तविक सौंदर्य उसकी अच्छाई में निहित है। निठुर जगत में भी, यह अच्छाई ही हमारी ढाल है। जो सभी के लिए सम्मान तथा भलाई के बीज बोता है, वह वास्तव में, अपने भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा होता है। यह कोई विकल्प नहीं, वरन् एक नैतिक अनिवार्यता है।
संसार की प्रकृति में द्वंद्व है – सुख, दुःख व दया और क्रूरता। इन बाहरी उतार-चढ़ावों में उलझने के बजाय, मनुष्य को अपनी आंतरिक स्थिरता (आत्म-शांति) पर ध्यान केंद्रित करना होगा। मौन रहकर किया गया सत्कर्म ही, वह शाश्वत ऊर्जा है जो अंततः नकारात्मकता को संतुलित करती है। भलाई का कार्य प्रचार नहीं, स्वयं का स्वभाव होना चाहिए।
जीवन का वास्तविक सार और सर्वोच्च आध्यात्मिकता हमारे कर्मों की पवित्रता में निहित है। निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही हमारी सच्ची उपासना है, और समस्त मानवता की सेवा, बिना किसी भेद-भाव के, साक्षात् ईश्वर की आराधना के समान है।
*सम्पादक :*
*युगपुरुष कविवर सूर्य*
*(भारतीय संस्कृति के अनुरूप दार्शनिक)*




