आलेख क्या है साहित्य

लेख : क्या है साहित्य..?
लेखिका-कवयित्री: सीमा जैन, खड़गपुर ।
जब तक कि दो-चार पंक्तियां सिर के ऊपर से नहीं निकलेगी, दोनों भौहें ऊपर-नीचे होकर, हथेली सिर पर सोचती मुद्रा में नहीं टिकेगी…साहित्य को चैन नहीं मिलेगा !! बेबस दिमाग अपनी सारी बुद्धि के घोड़े दौड़ाकर इन पंक्तियों को हल करने में जुटा रहेगा कि, “ये भी हो सकता है..वो भी हो सकता है”, पर अंत तक स्थिति असमंजस में ही रहने वाली होगी। किन्तु हां, गहन सोच में डूबा चालाक चेहरा… भिंचे-होठ और मंद-मंद मुस्कान से यही दर्शायेगा कि..समझ गए भैया, “वाह..वाह, क्या शानदार सृजन है”, आखिर साहित्य के बड़े पुराने खिलाड़ी ऐसे ही नहीं घोषित किए जा चुके हैं। उसके बाद वहां से खिसकने की थोड़ी जल्दी पड़ जाती है, कहीं किसी ने माथे की वक्र रेखाओं के बीच छुपी शंकित रेखा का चिट्ठा बांच लिया तो…?
आखिर क्यों है साहित्य इतना बेसुरा.. भिनभिनाता, जैसे कहीं अकाल में परवरिश पायी है, किसी सड़ी हुई लकड़ी पर कुकुरमुत्ते-सा उग आया है। सरल व्यक्ति के सीधे-सादे दिमाग में प्रवेश करने में उतनी ही आनाकानी है जैसे कोई नेता बिना गाजे-बाजे के किसी उत्सव में जाता नहीं हो। कई बार तो अनेक चीरफाड़ के बाद भी स्थिति मॉडर्न आर्ट की आड़ी-टेढ़ी रेखाओं की तरह जस-की-तस सोच में डूबी रहती हो, “शायद ऐसा हो सकता है..??”
महकते फूलों के बदले.. नाली किनारे बैठे कुत्ते के मुंह में दबी रोटी का टुकड़ा पसंद है, कोई सुंदर महल नहीं…किसी टपकती घास की छत के नीचे टेढ़ी खाट पर उकडु बैठा खांसता बूढ़ा चाहिए इसे, कभी हँसती-खिलखिलाती स्त्रियों की सुंदरता नहीं…अंधेरी गली के वीरान विद्यालय की टूटी दीवार के पार से आती घुटी-घुटी चीखों पर ही इसे शब्द सृजन करना होता है। कभी-कभी तो लगता है कि यदि दुनिया में दुःख-दर्द नहीं होते तो क्या साहित्य जन्म ले पाता, जीवित रह पाता..?? इसी नामुराद की जिजीविषा पूर्ति ने जीवन को असंख्य दुःखों से नवाज दिया है।
कभी-कभी सोचती हूँ कि प्रदर्शनियों की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से कटी-फटी काली-पीली तस्वीरें अपनी खूबसूरती या संदेश के बल पर बिकती है या कोने में स्टाइल से लिखे विख्यात नाम की वजह से ..? जाने ये तस्वीरें दुनियां का क्या भला करती और कहती है? फिर याद आया.. ओह, साहित्यिक कल्पना…एक ज्ञानवान चित्रकार के क्या जबरदस्त विचार है जिसने इसे किसी आलीशान घर के आरामदायक कोने में, महंगे से महंगे रंगों को सहेजकर ढेर सारी फुरसत में बनाया होगा। बीस बार मिटाकर फिर-फिर ठीक किया होगा, तभी तो करोड़ों में बिकेगी। क्या जाने, बनाते वक्त हृदयगत संवेदनशीलता आंखों के कोर भी भिगो पाई होगी कि नहीं..?
बदरंग समाज के नंगे फटेहाल लोग चाहिए, उजड़े वीरान घर-बस्ती चाहिए, बिखरे बाल उलझी लट चाहिए, पपड़ाते होठों पर अक्र-वक्र रेखाओं में उदास थके चेहरे चाहिए, तब कहीं जाकर साहित्य के जी को ठंडक मिलती है।
बस, दिल को छू ले..आंखों के कोर भिगो दे..साहित्य ऐसा सस्ता नहीं..!!
© कवयित्री सीमा जैन
लेखिका, खड़गपुर ।




