मैत्रेयी महाविद्यालय में, आत्म-शांति और मानसिक संतुलन पर आध्यात्मिक विमर्श

मैत्रेयी महाविद्यालय में, आत्म-शांति और मानसिक संतुलन पर आध्यात्मिक विमर्श, सभागार रहा खचाखच भरा :
दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध मैत्रेयी महाविद्यालय में नवस्थापित विदूषी अरुंधति भारतीय ज्ञान-परम्परा केन्द्र (VAC-IKS) की प्राचार्या प्रो. हरित्मा चोपड़ा के निर्देशन में तथा एनएसएस यूनिट और काउंसिल ऑफ इंडिक स्टडीज़ एंड रिसर्च, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा एवं मानसिक स्वास्थ्य : तनाव-नियंत्रण और आत्म-रक्षा के आयाम” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन महाविद्यालय के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह VAC-IKS का प्रथम शैक्षणिक उपक्रम था, जिसमें महाविद्यालय की छात्राओं एवं शिक्षकों के साथ-साथ भारतीय सेना के मेजर रैंक के अधिकारी (वर्तमान में जम्मू में तैनात) तथा दक्षिण भारत से आए युवा उद्यमियों ने भी सहभागिता की। सभागार विद्यार्थियों की उपस्थिति से पूर्णतया भरा हुआ था।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण, गणेश-वंदना और दीप-प्रज्वलन के साथ हुआ। उप-प्राचार्या प्रो. ज्योति सिंह ने स्वागत-उद्बोधन में नवस्थापित केन्द्र की शैक्षणिक दृष्टि तथा वर्तमान समय में मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर विचार प्रस्तुत किए। इसके पश्चात् केन्द्र के प्रभारी एवं नोडल अधिकारी तथा डिप्टी डीन, स्टूडेंट्स वेलफेयर, दिल्ली विश्वविद्यालय डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने केन्द्र के उद्देश्यों, कार्य-दिशा और भावी योजनाओं का संक्षिप्त परिचय दिया।
मुख्य वक्ता ‘मास्टरजी’ का व्याख्यान कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा। उन्होंने कहा कि तनाव कोई दोष नहीं, बल्कि यह संकेत है कि मन आत्मिक संतुलन और विश्राम चाहता है। बाहरी परिस्थितियाँ निरंतर परिवर्तनशील हैं, इसलिए यदि मनुष्य केवल बाहरी जगत की प्रतिक्रियाओं में उलझा रहे तो मन अस्थिर होना स्वाभाविक है। परन्तु जब मनुष्य अपना ध्यान भीतर की ओर ले जाता है और अपनी अंतर्निहित शक्तियों को पहचान लेता है, तब वह परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना स्वभावतः शांत, स्थिर और प्रसन्न रहता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि प्रसन्नता बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्म-अनुभूति औरत भीतर के प्रकाश से उत्पन्न होने वाली अवस्था है। उन्होंने श्वास-नियमन, ध्यान, आत्म-संवाद और मन को देखने की कला को दैनिक जीवन का अनिवार्य अभ्यास बनाने पर विशेष बल दिया। उनका वक्तव्य सरल, सहज, परन्तु गहन संवेदनात्मक स्पर्श लिए हुए था।
व्याख्यान के पश्चात संवाद-सत्र में छात्राओं ने जीवन-व्यवहार, अध्ययन-दबाव और भावनात्मक संतुलन से जुड़े प्रश्न रखे, जिनका उत्तर वक्ता ने अत्यंत शांत, स्पष्ट और मानवीय संवेदना के साथ दिया।
कार्यक्रम में डॉ. मीनू कुमारी, डॉ. कुमुद रानी गर्ग, डॉ. नीलिमा ओहरी, डॉ. नूपुर चावला और डॉ. हेमलता रानी सहित महाविद्यालय के अनेक संकाय सदस्य, बड़ी संख्या में छात्राएँ तथा बाहरी डेलीगेट्स उपस्थित रहे। वातावरण आत्मीयता, एकाग्रता और संवेदनशील सहभागिता से परिपूर्ण था। कार्यक्रम का समापन एनएनएस कार्यक्रम अधिकारी प्रो. स्मृति सिंह के आभार-प्रस्ताव के साथ हुआ।



