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रिश्वतखोरी हर जगह..

रिश्वतखोरी (दोहे)
रिश्वतखोरी हर जगह, इससे बचा न कोय।
बिन रिश्वत के आज भी, कोई काम न होय।१।
विषधर हैं कुछ देश में, करते खूब विकार।
मीठी वाणी बोलते, रखते गरल अपार।२।
जाल बिछाया आपने, पाला खुद ही रोग।
मुश्किल में जब पड़ गये, फिर दिखता परलोक।३।
पैसा भ्रष्टाचार का, फले नहीं हर बार।
दुःखियों के अभिशाप से, जल जाता घर-द्वार।४।
बना झोपड़ी को महल, दिखलाते ईमान।
जनता है सब जानती, इनके कर्म महान।५।
अपने अंदर झाँककर, सत्य बताना यार।
क्या तुम अपने कृत्य से, कर लोगे भव पार।६।
ऐसे विषधर का यहांँ, सभी करें संहार।
रिश्वतखोरी बंद हो, इसपर करे विचार।७।
डॉ. कृष्ण कान्त मिश्र
स्वरचित मौलिक
आजमगढ़ उ.प्र.




