न्यूज

मिथिलेश मधुकर रचित कभी-कभी काव्य संग्रह का लोकार्पण किया गया 

औरंगाबाद 8/2/26। जिला मुख्यालय औरंगाबाद के होटल जेड स्क्वायर के सभागार में जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन औरंगाबाद के तत्वावधान में मिथिलेश मधुकर रचित कभी-कभी काव्य संग्रह का लोकार्पण मुख्य अतिथि बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ, औरंगाबाद के अध्यक्ष डॉ सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह, डॉ सच्चिदानंद प्रेमी, भैरवनाथ पाठक, सुरेश चंद्र मिश्र, कमलेश पुण्यार्क, मनोज मिश्र पद्मनाभ, रामकृष्ण मिश्रा, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के पुस्तकालय मंत्री इंजीनियर अशोक कुमार सिंह,,मेहाल कुमार सिंह, संगीतानाथ एवं अन्य लोगों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत एवं पत्रिका का लोकार्पण किया। जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में आयोजित लोकार्पण समारोह का संचालन महामंत्री धनंजय जयपुरी द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वंदना पाठक के सरस्वती वंदना के साथ की गई। संस्था के संरक्षक शंभूनाथ पांडेय द्वारा आगत अतिथियों को अंगवस्त्र,पुष्पहार एवं प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया। विषय प्रवेश संस्था के उपाध्यक्ष डॉ सुरेंद्र प्रसाद मिश्र ने करते हुए कहा कि मधुकर जी ने साहित्य प्रेमियों को गढने का कार्य किया था।प्रोफेसर विजय कुमार सिंह ने कहा कि मधुकर जी की रचनाएं हमेशा से कालजई रहेंगी।शिवनारायण सिंह ने कहा कि मधुकर जी ने शब्द के चितेरे लिखकर सैकड़ो साहित्यकार बनाया।भैरवनाथ पाठक द्वारा कहा कि सुदूर देहाती क्षेत्र में उनकी प्रेरणा ने कई लोगों को साहित्य लिखने के लिए प्रेरित किया।कमलेश पुण्यार्क ने कहा कि मधुकर जी हमेशा से मधुकर हैं और दिनकर निराला से ऊपर हैं। सुरेश चंद्र मिश्र ने कहा कि उनके जीवन की साहित्यिक व्याख्या नहीं की जा सकती‌।मनोज मिश्रा पद्मनाभ ने उन्हें साहित्य रत्न बताया‌।बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के पुस्तकालय मंत्री अशोक कुमार सिंह ने काव्य पाठ के माध्यम से मधुकर जी को श्रद्धांजलि दी ।डॉ सच्चिदानंद प्रेमी ने उनके साथ बिताए गए पलों को साझा किया और कहा कि मधुकर तो सिर्फ मधुकर हैं। मुख्य अतिथि डॉ अनिल सुलभ ने कहा कि मधुकर ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने सबके हित की बात की।केवल साहित्य लिख देने से ही कोई साहित्यकार नहीं हो सकता।उसके साहित्य को हर कोई पढे।आज के इस साहित्यिक संकट के दौर में व्यक्ति लिखना चाहता है लेकिन किस तरह लिखना है यह किसी को नहीं पता। साहित्यकार को ऐसा लिखना चाहिए जो जब कोई पाठक उसे पढ़े तो उसे अपना लगे। हिंदी भाषा की पठनीयता कमी नहीं है।मधुकर जी के काव्य रचना राष्ट्रीय चेतना,राष्ट्रीय नवजागरण, प्रेम,व्यंग्य और संपूर्ण साहित्य का द्योतक है। उन्होंने साहित्यकार के साथ-साथ समाज को जोड़ने का कार्य किया था।कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई।मौके पर चंदन कुमार,विनय मामूली बुद्धि,नागेंद्र केसरी,डॉ संजीव रंजन, रामकिशोर सिंह, चंद्रशेखर साहू, लवकुश प्रसाद सिंह, श्रीराम राय ,रंजनी रंजन मिश्र, लालदेव प्रसाद,नीरज पाठक, संतोष मिश्रा, प्रो राजेंद्र सिंह, अशोक पांडेय,सुरेश विद्यार्थी सहित अन्य उपस्थित थे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button