हिन्दी दिवस : मेरी पहली ज़िम्मेदारी

13 सितम्बर 2025 का दिन मेरी ज़िन्दगी का एक अविस्मरणीय अध्याय बन गया। यह पहला अवसर था जब मैंने एक CTM के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और किसी आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई। यह अवसर था हिन्दी दिवस का, जिसका आयोजन लाइट गया NGO द्वारा किया गया था। मेरे लिए यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक ऐसी यात्रा थी जिसमें खुशी, अनुभव और सीख एक साथ मिले।
तैयारी और ज़िम्मेदारी:
मेरी टीम के अनुसार मुझे वित्तीय रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा गया था। साथ ही मुझे विजेताओं का चयन करने जैसे कार्यों में भी भाग लेना था। यह कार्य शुरुआत में चुनौतीपूर्ण लगा, क्योंकि इसमें केवल हिसाब-किताब ही नहीं बल्कि निष्पक्षता और पारदर्शिता भी ज़रूरी थी।
सौभाग्य से, मेरे साथ मेरी सीनियर CTM भी थीं, जिन्होंने पूरे समय मेरा मार्गदर्शन किया। ज़िम्मेदारियों को बाँटना, बच्चों को संभालना, और अचानक आने वाली कठिनाइयों से निपटना—इन सबमें उनका अनुभव और सलाह मेरे लिए प्रेरणा बन गई। उनके सहयोग ने मुझे आत्मविश्वास दिया और यह सिखाया कि नेतृत्व का असली अर्थ टीम वर्क और सहयोग में छिपा है।
आयोजन पास के ही एक हाई स्कूल में किया गया था। उद्देश्य था बच्चों को मनोरंजक गतिविधियों के माध्यम से हिन्दी भाषा का महत्व समझाना। शुरू से ही मुझे एहसास हो गया था कि यह आयोजन धैर्य, रचनात्मकता और समन्वय की परीक्षा लेने वाला है।
रंगारंग आयोजन:
जैसे ही हम स्कूल पहुँचे, वातावरण उत्साह से भर गया। बच्चे बेहद खुश थे, शिक्षक सहयोगी थे और मेरे साथी CTM पूरी लगन से जुटे हुए थे।
कार्यक्रम की शुरुआत हिन्दी दिवस के महत्व को बताने से हुई। इसके बाद गतिविधियाँ शुरू हुईं—
क्विज़ प्रतियोगिता – बच्चों की जानकारी और तर्कशक्ति की परीक्षा।
कहानी व निबंध लेखन – बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहन।
खेल-कूद एवं अन्य गतिविधियाँ – जोश और हँसी से भरे पल।
.नृत्य और गायन प्रस्तुति – वातावरण को मधुरता और लय से भर देना।
पुरस्कार वितरण – प्रतिभा और मेहनत का सम्मान।
मिठाई और स्टेशनरी वितरण – छोटे-छोटे उपहार जो बच्चों के चेहरों पर बड़ी मुस्कान बन गए।
बच्चों का उत्साह ही कार्यक्रम की असली खूबसूरती था। उन्होंने पूरे मन से भाग लिया और हर पल को त्यौहार की तरह जिया।
एक यादगार पल:
हालाँकि हर क्षण यादगार था, लेकिन एक पल ऐसा था जिसने सभी को हँसा दिया। एक बच्ची मंच पर कविता सुना रही थी। उसे कहना था—“एक चुटकी सिंदूर की क़ीमत”, लेकिन उसने गलती से बोल दिया—“दो चुटकी सिंदूर”। पूरा हॉल ठहाकों से गूंज उठा और वह बच्ची शरमा गई। यह पल मासूमियत से भरा और बेहद प्यारा था।
अनुभव और सीख:
दिन के अंत तक जब प्रतियोगिताएँ पूरी हुईं, पुरस्कार बाँटे गए और बच्चों को मिठाइयाँ व स्टेशनरी मिली, तो चारों ओर एक संतोष का भाव था। बच्चों ने हिन्दी भाषा के महत्व को समझा और आत्मविश्वास तथा रचनात्मकता सीखी।
मेरे लिए यह आयोजन परिवर्तनकारी रहा। मैंने सीखा कि बड़ी संख्या में बच्चों को संभालने के लिए धैर्य और शांति आवश्यक है। मैंने टीम वर्क का महत्व समझा और यह भी जाना कि छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियाँ निभाने में कितनी गहराई छिपी होती है।
मेरी सीनियर CTM ने पूरे समय मेरा मार्गदर्शन किया। उन्होंने मुझे सिखाया कि मुश्किल हालात में धैर्य कैसे बनाए रखें, बच्चों को कैसे व्यस्त रखें और टीम को एक साथ लेकर कैसे चला जाए। उनकी सलाह और सहयोग ने मुझे और बेहतर CTM बनने की प्रेरणा दी।
सबसे बड़ी सीख यह रही कि छोटी-सी मिठाई या स्टेशनरी बाँटने जैसे कार्य भी बच्चों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं। उनकी मुस्कान और चमकती आँखें मेरे लिए अमूल्य थीं।
निष्कर्ष:
मेरा पहला आयोजन केवल ज़िम्मेदारी नहीं था, बल्कि जीवन का एक यादगार अनुभव था। बच्चों की हँसी, शिक्षकों का सहयोग, टीम का साथ और सीनियर CTM का मार्गदर्शन—सबने मिलकर इस दिन को खास बना दिया।
पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि यह आयोजन केवल हिन्दी दिवस मनाने के लिए नहीं था, बल्कि यह इंसानियत, खुशी और सीख का उत्सव था। इसने मुझे सिखाया कि नेतृत्व का अर्थ सेवा है, सफलता का आधार टीम वर्क है और शिक्षा तभी यादगार बनती है जब उसमें आनंद जुड़ा हो।
दिन समाप्त हो गया, लेकिन इस दिन से मिली सीख और अनुभव मुझे आगे भी प्रेरित करते रहेंगे। सचमुच, 13 सितम्बर 2025 मेरे जीवन का वह दिन था, जो हमेशा मेरी यादों और दिल में मुस्कान लेकर रहेगा।
अंकिता राज
गया कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, गया से बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (B.Tech) की पढ़ाई कर रही हूँ।
मैं भागलपुर (बिहार) की रहने वाली हूँ।




