मनुष्य द्वारा किया गया कोई भी पाप उसके शोक _संताप और पतन का कारण बनता हैं

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मनुष्य द्वारा किया गया कोई भी पाप उसके शोक _संताप और पतन का कारण बनता है।
इस संसार में अनेक विचार धारा के लोग होते हैं। सभी की अपनी जीवन शैली और कार्य करने की पद्धति होती हैं। पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो खुद पर ध्यान न देकर औरों के जीवन में दखल देते हैं, जिससे उन्हें बेवजह शारीरिक_ मानसिक तकलीफ का सामना करना पड़ता हैं ।हर इंसान की चाह होती हैं उनका हर पल सुखद हो ,जिसके लिए वे प्रयास करते हैं । मनुष्य जीवन की अनंत व्यथाएं हैं, पर खुशियों की उम्मीद लेकर सभी सफर करते हैं। जब हम अपने व्यवहार से किसी को मानसिक खुशी देते हैं ,तब हम भी उसे पाने के अधिकारी होते हैं। किसी को दर्द देकर अपने लिए अच्छे जीवन की कामना व्यर्थ हैं।
हर इंसान के रिश्ते _नाते ,मित्र ,सगे _संबंधी होते हैं।एक दूसरे से सभी भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं। कभी_कभी वैचारिक मतभेद भी हो जाते हैं,किसी से नाराजगी हो जाती हैं। एक दूसरे से बहुत सी अपेक्षाएं होती हैं और पूर्ण न होने पर मनमुटाव स्वाभाविक हैं। हर किसी की अपनी सोच होती हैं, किसी पर एकाधिकार उचित नही ।सभी स्वतंत्र हैं अपने अनुसार जीवन निर्वहन के लिए। साथ रहकर भी कई लोगों के मन नहीं मिलते एक दूसरे की छवि धूमिल करने में लगे रहते हैं। जो रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं हैं उनमें आपसी प्रेम विश्वास का भाव नहीं हैं तो अलगाव उत्पन्न हो जाते हैं ऐसी स्थिति में।।आपस में रहकर जब हम किसी के जीवन में साहस_ संयम ,मर्यादा _संस्कार,प्रेम_ करुणा का संचार करते हैं ,तब ऐसे रिश्ते समय के अनुसार और गहरा होता हैं ,उनमें कोई संदेह नहीं ।अगर हम किसी के साथ रहकर उन पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण करें तो उनका मन बोझिल हो जाता है, वे दूर जाने का बहाना देखते है, ऐसे रिश्ते से घुटन होती हैं। हर पल अच्छे कर्म के लिए खुद को प्रेरित किजिए। कई आदतें होती हैं जिसकी वजह से हमें नुकसान होता हैं।अभ्यास से सब कुछ सही होता हैं। पुण्य और पाप कर्म में उलझें मनुष्य को समझना जरूरी हैं कि _हम जो करते हैं ,उससे हमारा जीवन पूरी तरह प्रभावित होता हैं । हर कर्म का परिणाम अवश्य मिलता ही हैं।
सदकार्य करके हम पुण्य फल के भागीदार बनते हैं, यह मनुज तन सफल होता हैं,अपने जीवन को सरल बना सकते हैं। अनावश्यक ऐसे विचार _कार्य और व्यवहार जो किसी के हित में नहीं हैं, उसे करके कभी जीवन में शांति नहीं मिलती हैं। जिस कार्य से औरों के जीवन में कलह _द्वेष, विवाद_ तनाव उत्पन्न हो उसे करने से बचना चाहिए ।जीवन में कई ऐसी परिस्थिति आती हैं ,जब हम हताश हो जाते हैं लेकिन उस समय हमें अपनी अंतरात्मा की पुकार सुननी चाहिए। कभी भी नकारात्मक नहीं सोचना। खत्म कुछ नहीं होता ।जब तक जीवन हैं , गिरना_उठना , चलना और लड़ना हैं ।भागिए मत! नया करिए ,सोचिए!और सीखते रहिए। जो मनुष्य अपने हालात से समझौता नहीं कर पाते ,वे हमेशा दुखी ही रहते हैं।
यह जीवन विभिन्न मोड़ से होकर गुजरती हैं जहां ,अच्छे_ बुरे हर तरह के लोगों का सामना करना होता हैं। जाने _अनजाने में हम ऐसे कर्म कर ही बैठते हैं जो नहीं करना चाहिए ।अपने बुरे कर्म का पता होना चाहिए और उस पर नियंत्रण अवश्य करनी चाहिए । बहुत सी ऐसी बातें हैं जो पाप कर्म की श्रेणी में आते हैं, पाप कम हो या ज्यादा उसका नुकसान हमें होता ही हैं।
पाप कर्म में लिप्त मनुष्य हमेशा शोकाकुल रहते हैं ,उनका मन हमेशा व्याकुल होता हैं वे कभी किसी के लिए भला नहीं करते ,वे अपने जीवन से संतुष्ट नहीं रहते । रोग _शोक से ग्रसित हो जाते हैं एक समय के बाद। जो पाप कर्म में लिप्त होते हैं ऐसे व्यक्ति के लिए किसी में दया भाव नहीं होता । जो गलतहैं , उसका विरोध करना समझदारी का काम हैं।क्रोध ,वासना _लोभ,भोग_ विलास, छल_ कपट ,षडयंत्र_ धोखा, बेईमानी _भ्रष्टाचार लूट _आतंक ,हिंसा_ झूठ ,किसी को शारीरिक मानसिक रूप से प्रताड़ित करना,अपहरण, हत्या, निंदा,स्वार्थ भाव, बुरी नियत,किसी को बेवजह ताना देकर दिल दुखाना, जलन, ठगी करना, अत्याचार ,अन्याय करना, किसी को पारिवारिक _सामाजिक ,राष्ट्रीय स्तर पर झगड़े _विवाद, दंगे _बहस ,कलह के लिए उकसाना। पशु पक्षियों को मारना, मांस_ मदिरा का सेवन आदि पाप के अंतर्गत आता हैं।पापी मनुष्य भाव शून्य होते हैं ,उनमें सही गलत का निर्णय लेने की क्षमता खो जाती हैं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और बदले के भाव के लिए कोई भी गलत दिशा अपनाने से संकोच नहीं करते।
जब भी किसी से मिलें आत्मीय व्यवहार दिजिए । मर्यादित शब्दों का प्रयोग किजिए और हर किसी के प्रति विन्रम रहिए। ऐसे कार्य किजिए जिससे आपको कभी आत्म ग्लानि न हो। पवित्र भाव से रहिए ,कभी किसी के लिए गलत मत सोचिए !किसी को हराने की बजाय हमेशा उनकी जीत में सहयोगी बनिए।
पापी व्यक्ति का अंतःकरण हमेशा अपवित्र होता हैं ,जिसकी वजह से उनमें सद्विचार नहीं पनप पाते। जो पाप कर्म की ओर अग्रसर होते हैं उनमें ,क्षमा _करूणा, दान_दया, स्नेह_सहयोग के भाव नहीं आते। वे सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, वे मानवता के लिए कार्य नहीं करते ,बस खुद को सुखी_ संपन्न ,सुविधा_भोगी बनाने मे लगे रहते हैं।
पुण्य कर्म जिसे करने से हमें आत्मिक खुशी होती हैं ।जब हम हर उस कार्य के लिए तैयार रहते हैं, जिससे मानव का कल्याण हो। अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर अपना जीवन औरों के लिए समर्पित करते हैं। दिन दुखी _गरीबों की मदद करते हैं ,उनकी करुण पुकार सुनते हैं ।जरूरत मंद के सहयोग के लिए हाथ उठते हैं ।किसी से भेदभाव नहीं करते ,सभी को सामान समझकर उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। अपनी मेहनत की कमाई से जीवन निर्वहन करते हैं। सेवा _त्याग और साधना के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।सांसारिक जीवन में राहत हुए भी आत्म _कल्याण के लिए कार्य करते हैं, दूसरों को खुश रहने की वजह देते हैं। समस्त जीव_ जंतु एवं प्राणियों के प्रति प्रेम रखते हैं ,किसी का बुरा नहीं चाहते।सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं।ईश्वर पर विश्वास कर सही कर्म के लिए संकल्पित होते हैं तब हम पुण्य आत्मा होते हैं।
हर मनुष्य के पास दो रास्ते होते हैं _पाप और पुण्य कर्म।हम जिस राह को अपनाएंगे उसी के अनुसार हमें फल मिलता हैं ।हर कोई जानते हैं जीने के लिए क्या जरुरी हैं? जानते हुए भी अगर हम अधिक लालच_ दिखावे और अपने सुख के लिए जब गलत कार्य करते हैं और पाप के भागीदार बनते बात हैं,तो हम खुद को अपने हाथों अपना अमूल्य जीवन बर्बाद करते हैं।पाप करने से जीवन में कहीं सुकून नहीं होता । पाप कर हम कितने भी धन _दौलत कमा के लेकिन सुखद एहसास और अलौकिक आनंद की प्राप्ति सदसंग, सदकार्य और विचार से ही आते हैं।
लेखिका/कवयित्री
-सुश्री सरोज कंसारी
नवापारा राजिम




