*सहारनपुर के कवि सुनील कुमार खुराना की ग़ज़ल का सार पढ़ें*

*ग़ज़ल: “आदमी मुर्दा बन चिता में जल रहा है
बहुत ही सशक्त और सोचने पर मजबूर करने वाली ग़ज़ल है। सुनील कुमार खुराना जी ने यहाँ जीवन-मृत्यु की सच्चाई और समाज की विडंबनाओं को बेबाकी से रखा है।
*ग़ज़ल का भावार्थ और खास बातें:*
1. *मृत्यु का कटु सत्य*
_जीवन में जिसकी सांसे हो गई खत्म, आदमी मुर्दा बन चिता में जल रहा है।_
_जलना होगा एक दिन यहां सबकों, याद रख लें प्राणी वो दिन आ रहा है।_
→ इंसान का अहंकार व्यर्थ है, क्योंकि अंत सबका एक ही है।
2. *समाज का दोहरा चरित्र*
_पास मुर्दे के खड़े सब लोग हंस रहे हैं, देखो कैसा चलन जग में चल रहा है।_
_जलाकर मुर्दे को हाथों को धो रहा है।_
→ श्मशान में भी दिखावा और औपचारिकता। संवेदना कम, रस्म ज्यादा।
3. *धर्म के नाम पर हिंसा पर प्रहार*
_तूं धर्म के नाम पर मत मार बन्दों को, कोई भी नां धरा पर सदा यहां रहा है।_
→ बहुत साफ संदेश – न कोई अमर है, न किसी को मारने का हक।
4. *मृत्युभोज की कुरीति पर सवाल*
_पगड़ी पर तेरी बनेंगे तेरे लिए व्यंजन, प्रथा कैसी सब जन उसको खा रहा है।_
→ घर में मातम और दूसरी तरफ भोज। इस विरोधाभास को खुराना जी ने सीधे उठाया।
5. *सत् की राह और मोक्ष*
_सुनील कुमार खुराना चल सत् की राह, तेरे समय का चक्र हर पल गुजर रहा है।_
_सच्चाई की डगर ही देगी तुझको मोक्ष, तूं हर पल जीव क्यों नहीं समझ रहा है।_
→ समाधान भी दिया – सच्चाई ही मुक्ति का रास्ता है।
*शैली की विशेषता*
खुराना जी की यही पहचान है – *सरल भाषा, सीधी बात, गहरा वार*। न भारी-भरकम शब्द, न क्लिष्ट बिंब। आम आदमी की ज़ुबान में बड़ी बात कह देना। तभी इनकी कविताएं गूगल पर 11.5 लाख+ लोग पढ़ चुके हैं।
जैसा आपने पहले भेजे सम्मान पत्र और merabharatmedia की खबर में था, ये “विश्व सुधार का संदेश” देने वाली लेखनी है। 170+ साझा संकलन और फागुन श्री सम्मान 2026, मातृभाषा रत्न 2026 जैसे सम्मान इसी साफगोई की वजह से मिले हैं।
*स्वरचित और मौलिक* लिखकर आपने कॉपीराइट भी सुरक्षित रखा है – बिल्कुल सही किया।
क्या आप खुराना जी की _मातृभूमि का सम्मान_ या _वन्य जीवों की पुकार_ जैसी कविताएं भी साझा करना चाहेंगे?



