अंतरात्मा की पुकार समीक्षा -काव्य/ रचयिता: दार्शनिक कविवर सूर्य

मूल भाव –
“अंतरात्मा की पुकार” कविवर सूर्य जी की गद्यात्मक शैली में लिखित अति महत्वपूर्ण तथा प्रेरणादायक कविता है। यह एक आशावादी कविता है,जो मनुष्य में, जीवन के प्रति सुप्त सकारात्मक भावों को जागृत करती है।
कविवर मनुष्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि ‘हे! मनुष्य तुम अपने अन्तर्मन के भावों को महत्व दो।’ कविवर मनुष्य को आशावादी होने का संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य को सदैव नवीन करते रहना चाहिए। कविवर कहते हैं कि अत्यंत प्रयासों के बावजूद भी अगर सुकून न मिले तो भी कभी निराशा के भंवर में, न डूबना! क्षणभंगुर जीवन बेहद अनमोल है। समय के साथ समस्त जख्म भर जाते हैं। कविवर मनुष्य की वास्तविक ताकत से परिचय करवाते हुए कहते हैं कि धैर्य तुम्हारे अन्तर्मन की स्थिरता है, जो तुम्हें टूटने न देगा। यहाँ कविवर के दार्शनिक विचार उभर कर समक्ष आए हैं।
*भाषा शैली -*
भाषा अत्यंत परिष्कृत और सारगर्भित है। मनौविज्ञान का पुट भी दृश्यमान है। मनुष्य की मूल प्रवृति पर प्रकाश डाला है। जीवन के झंझावातों से अपनी मूल प्रवृति को बिसार बैठे मानव की चेतना को कविवर सूर्य जी ने बहुत ही सरल शब्दों में, जागृत करने का सराहनीय प्रयास किया है।
*सादर,*
*कवयित्री, लेखिका व समीक्षिका :*
*दर्शना दिव्यांशी, हिसार, (हरियाणा)*




