साहित्यिक

डॉ पूर्णिमा पांडेय ‘पूर्णा’ द्वारा लिखित पुस्तक “प्रयागराज महाकुंभ 2025 (आस्था का महा मेला)” की समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार, कवि आ.सुरेश जोशी द्वारा

डॉ पूर्णिमा पांडेय ‘पूर्णा’ द्वारा लिखित पुस्तक “प्रयागराज महाकुंभ 2025 (आस्था का महा मेला)”की समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार, कवि आ.सुरेश जोशी द्वारा

आदरणीया पूर्णिमा पांडेय द्वारा लिखित पुस्तक “प्रयागराज महाकुंभ 2025 (आस्था का महा मेला)” को लोक रंजन प्रकाशन प्रयागराज द्वारा प्रकाशित किया गया है। वर्ष 2025 में प्रकाशित इस पुस्तक में कुल 80 पृष्ठ हैं और इसका आईएसबीएन 978-81-0000 है। यह पुस्तक लेखिका ने अपने पतिदेव आदरणीय राकेश पाण्डेय जी को समर्पित की है, जिनकी वजह से वह महाकुंभ 2025 का कल्पवास पूरा कर पाईं। चौथे पृष्ठ पर अरैल की ओर से संगम को आने वाले पैंनटून ब्रिज का चित्र लगाया गया है उसके अगले पृष्ठ में लेखिका ने अपने मन की बात रखी है। जिसमें उन्होंने क्रमश: अपने पतिदेव और अपने देवर का आभार व्यक्त किया है जिनकी वजह से वह कुंभ मेला में कल्पवास सफलता पूर्वक पूर्ण कर पाईं और उनकी यह पुस्तक प्रकाशित हो पाई। इस पृष्ठ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय योगी आदित्यनाथ जी का स्नान करता हुआ चित्र लगाया गया है। पृष्ठ 7 एवं 8 में अनुक्रमणिका है जिसमें उनकी कविताओं व आलेख के विषय का उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम लेखिका द्वारा गंगा मैया की स्तुति की गई है उसके बाद निंबकाचार्य पीठ प्रयागराज का वर्णन किया है जहां रुक कर उन्होंने 35 दिन का कल्पवास किया इस दौरान जो जो कार्यक्रम आयोजित किए गए उनका भी उल्लेख किया गया है। इसके अगले पृष्ठ में कुछ तस्वीरें और इसके पश्चात महाकुंभ, पौष पूर्णिमा, कल्पवास, गंगा तट पर, मकर संक्रांति का पर्व मनाया, तीर्थराज प्रयाग इन सबको पढ़कर ऐसा लगता है जैसे हम स्वयं महाकुंभ घूम रहे हों। किन्नर अखाड़ा और आध्यात्मिक चेतना का पर्व में उन्होंने किन्नरों से मिलने और विभिन्न वेशभूषा में सुसज्जित तपयोग हठयोग करते संत महात्माओं के बारे में बताया है। इसके बाद त्रिवेणी स्नान का वर्णन, एक किन्नर व उसके जीवन में आने वाले सुख व दुखों का वर्णन किया गया है। तत्पश्चात कुंभ मेला में आए विदेशी मेहमानों से मिलने व पंडित देवकीनंदन ठाकुर के पंडाल में जाकर कथा श्रवण करने का अपना अनुभव बताया है। उसके बाद दंडी बाबा, रुद्राक्ष वाले बाबा, कांटे वाले बाबा, घड़ी वाले बाबा, रबड़ी बाबा, हठयोगी बाबा चिमटे वाले बाबा, कबूतर वाले बाबा के विषय में बताया है। रुद्राक्ष वाले बाबा अपने सर और गले में सवा लाख रुद्राक्ष धारण करते हैं और कांटे वाले बाबा कई वर्षों से कांटों की सेज पर लेटे रहते हैं।

कल्पवास में क्या पाया हे महाकुंभ, महाकुंभ, कुंभ नगरी, जय महाकुंभ, उमंग ही उमंग कविताओं में उन्होंने महाकुंभ और अपने अनुभव के बारे में बताया है।

इसके बाद उन्होंने मां गंगा के स्नान के लिए बुलावे के साथ नाग वासुकी मंदिर का वर्णन किया है।पुनः किन्नर अखाड़े जाकर उनके महामंडलेश्वर के साथ मुलाकात करने और आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त ₹ 1/- रुपए का वर्णन भी किया है।

महाकुंभ वह स्थान है जहां पर एक समय पर विश्व के सबसे अधिक व्यक्ति इकट्ठा होते हैं। लेखिका ने महाकुंभ की कानून व्यवस्था को चुस्त व दुरुस्त करने के लिए पुलिस के जवानों की भी भूरी भूरी प्रशंसा की है।

पुस्तक के अंतिम भाग में उन्होंने सतुवा बाबा के दर्शन, अपने कान्हा जी, संगम में संगम व सफाई की व्यवस्था का वर्णन किया है। करोड़ों की भीड़ आने के बावजूद भी कुंभ क्षेत्र वास्तव में काफी साफ सुथरा रखा गया जिसके लिए सफाई कर्मी बधाई के पात्र हैं।

महाकुंभ 2025 की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के गंगा पूजन से हुई। दो दो राज्यों की पूरी कैबिनेट कि यहां पर बैठक करी और बैठक से पूर्व उन्होंने स्नान भी किया।

यह पूरी पुस्तक लेखिका आदरणीया पूर्णिमा पांडे जी के कल्पवास के दौरान अपने परिवार के साथ विभिन्न अखाड़ों, बाबाओं के दर्शन आदि का वर्णन है। अपनी पोती उर्वी को भी उन्होंने इस पुस्तक में एक पृष्ठ दिया है। यह कहा जा सकता है कि यह उनकी 35 दिनों की कुंभ क्षेत्र प्रयाग की आत्मकथा है। इस पुस्तक में महाकुंभ 2025 के भ्रमण के दौरान लिए गए चित्र भी प्रत्येक कविता या आलेख के साथ प्रकाशित किए गए हैं।

पूरी पुस्तक, जो बहुत ही सरल भाषा में लिखी गयी है, को पढ़कर कुछ ऐसा अनुभव होता है जैसे हम किसी सिनेमा हॉल में बैठकर कोई चलचित्र देख रहे हैं जिसमें महाकुंभ 2025 के एक-एक दृश्य हमारी आँखों के आगे से गुजर रहे हों। तंबुओं के शहर महाकुंभ की मुख्य पहचान है अनेकता में एकता तथा सनातन धर्म का सबसे विशाल आयोजन। इस अवधि में करोड़ों व्यक्ति एक समय में एक स्थान पर बिना किसी कष्ट की परवाह किए एकत्रित होते हैं।

यह भारत की संस्कृति व आध्यात्मिक चेतना का विशाल समागम है। यहाँ रंग, रूप, जाति, धर्म, वेशभूषा की परवाह किये बिना लोग एक दूसरे के साथ गङ्गा मैया की गोद में डुबकी लगा पुण्य प्राप्त करने के साथ साथ “गङ्गा माता की जय” से पूरे कुंभ क्षेत्र को गुँजायमान कर देते हैं, और खुशी खुशी घर का वापस होते हैं।

वैसे भी कहा गया है “गंगे तव दर्शनात मुक्ति” तो जिसने नहा लिया तो कहने ही क्या। कोई तो बात होगी तभी तो लाखों विदेशी भी प्रयाग पधार कर गङ्गा जी में स्नान करते हैं।

मेरी दृष्टि में “प्रयागराज महाकुंभ 2025” नामक यह पुस्तक पढ़ महाकुंभ भ्रमण का पूरा आनंद लिया जा सकता है।

आपको मेरी ओर से इस पुस्तक हेतु बहुत-बहुत बधाइयाॅं एवं शुभकामनाएं।

 

सुरेशचन्द्र जोशी “सहयोगी” उत्तराखंड, पिथौरागढ़।

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