भगवान की कृपा दृष्टि बनी रहती है – पं. आदित्य प्रकाश त्रिपाठी

सतना , परमात्मा जिनकी ओर कृपा दृष्टि करते हैं उनकी बुद्धि में ज्ञान का जन्म होता है ज्ञान किसी खास प्रयत्न से नहीं मिलता।प्रयत्न करने से, पुस्तक पढ़ने से शब्द ज्ञान बढ़ सकता है।जगत में ऐसा दिखाई देता है कि जिसका शब्द ज्ञान बढ़ा हुआ है उसके भीतर अभिमान भी बढा हुआ रहता है ज्ञान का मतलब यह नहीं है कि दूसरों को छोटा समझा जाए और अपने को बड़ा समझा जाए,ज्ञान का फल है सब में श्री कृष्ण का दर्शन, सब के प्रति भगवत भाव जागे,हृदय प्रेम में पिघलने लगे तो यह ज्ञान का लक्षण है ।जब ज्ञान प्रकट होता है तब अभिमान मर जाता है अभिमान बढ़ने लगे तो समझ लेना चाहिए ज्ञान वहां है ही नहीं केवल ज्ञान की प्रतीति मात्र है। ज्ञान तो परमात्मा देते हैं इसीलिए गीता में अर्जुन ने जब बहुत सयानेपन की बातें करना प्रारंभ किया तो भगवान ने कहा की अपना यह सयानापन छोड़ दे ज्ञान तो मैं देता हूं वह मेरी कृपा से मिलता है और इसीलिए जब हम संतों का चरित्र पढ़ते हैं तो यह पता चलता है कि वह किसी के घर पढ़ने के लिए नहीं गए। ब्रज के भक्तों को किसने ज्ञान दिया था,मीराबाई किसके घर वेदांत पढ़ने गई थी, तुकाराम,संत एकनाथ सब परमात्मा की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त करते हैं। पंडित लोग पुस्तक पढ़कर बोलते हैं और संत भगवान के दर्शन करके बोलते हैं पंडितों के द्वारा बोले गए शब्दों का असर मन पर पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा यह नहीं पता पर जो लोग परमात्मा की कृपा का अनुभव करके बोलते हैं उनका असर जरूर पड़ता है इसीलिए सुख का प्रसंग हो चाहे दुख का, सम्मान का हो या अपमान का, जिनके हृदय हर समय श्री कृष्ण के प्रेम में डूबा रहता है उन पर भगवान की कृपा दृष्टि बनी रहती है पर आज कृपा का स्वरूप लोगों ने धन को मान लिया,जब धन ज्यादा हो जाए तो लोग कहते हैं भगवान की कृपा हो गई पर धन को धर्म की मर्यादा में रहना चाहिए धन साध्य नहीं साधन मात्र है इसीलिए धन का एक नाम अर्थ भी है और इस अर्थ ने अनेकों बार अनर्थ भी कर दिया है हम जितनी याद,जितना स्मरण अपने धन का करते हैं उसका आधा भी यदि भगवान का स्मरण हो जाए तो हमारे ज्ञान चक्षु खुल जाएंगे। जब श्री कृष्ण कृपा करते हैं तब व्यक्ति के जीवन में प्रेम देते हैं इसीलिए श्रीमद् भागवत के गोपी गीत में श्री कृष्ण को सुरत नाथ शब्द से संबोधित किया गया है सुरत शब्द का अर्थ होता है -प्रेम। गोपिया कहती हैं आप हमें कुछ न देकर के केवल प्रेम दे दें।



