प्रेरणादायक, महत्वपूर्ण: ‘प्रेम का बदलता स्वरूप’

(आलेख)
प्रेम, शब्द मात्र बल्कि, स्वयं में पूरा एक ब्रह्मांड है। यह काव्य, प्रकृति की सुंदरता और त्याग व आत्मीयता का संगम है। वास्तव में, प्रेम को परिभाषित करना आसान कार्य नहीं। वर्तमान समय में प्रेम की परिभाषा ही बदल गई है। युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक प्रेम के नाम पर घर छोड़कर भाग रहे हैं। कभी सास दामाद के साथ भागती है तो कभी चार बहुओं की सास बहुओं के जेवर लेकर प्रेमी संग फरार हो जाती है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर पत्नी पति को ठिकाने लगा रही है तो कहीं पति पत्नी के टुकड़े कर शूट केस में भर देता है। हाल ही की घटना में पत्नी ने हनीमून पर ही पति की सुपारी दे डाली। अब ये घटनाएं आम होती जा रही हैं। और हर घटना के पीछे प्यार का आधार दिया जाता है।क्या किसी का खून करने वाली स्त्री या पुरुष किसी से प्रेम कर सकते हैं? मुझे नहीं लगता ऐसे लोग किसी से भी प्रेम कर सकते हैं।ये क्षणिक आकर्षण और वासना है।प्रेम त्याग सिखाता है,समर्पण सिखाता है,अपनी नहीं दूसरों की खुशी देखता है, प्रेम तपना सिखाता है, प्रेम के नाम पर सुपारी देना, मर्डर कर देना, अपने ही घर को लूट लेना…ये कैसा प्रेम है। जो व्यक्ति अपने परिवार का नहीं हो सकता ! भला वह किसी और का कैसे हो सकता है? प्रेम जैसे उत्कृष्ट शब्द को समाज में घटित होती निकृष्ट घटनाओं से जोड़ना उचित नहीं लगता।
विचारणीय बात यह है कि जो लोग इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं क्या केवल वही दोषी है? या हमारा सामाजिक ताना बाना इस तरह का हो गया है जिससे स्व केंद्रित मानसिकता जन्म ले रही है। या हमारी शिक्षा व्यवस्था साक्षर कर रही है ,शिक्षित नहीं। संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। व्यक्ति चमक दमक और रुपए – पैसों की ओर बेतहाशा भाग रहा है। वह अपने सुख और वासना पूर्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार है।
जहां पहले भारतीय शिक्षा पद्धति में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मानवीय गुणों का विकास होता था वहीं आज शिक्षा का उद्देश्य अधिक धनोपार्जन मात्र रह गया है। बचपन से ही माता पिता बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनने के लिए प्रेरित करते हैं लेकिन, एक अच्छा इंसान बनने की शिक्षा देना भूल जाते हैं।
हमारी संस्कृति में बचपन से ही दान देना सिखाया जाता था। बच्चे के जन्मदिन पर ग्रह पूजन किया जाता था।बच्चे द्वारा गरीबों को दान दिलाया जाता था। जिससे बच्चों में दान देने की प्रवृत्ति का विकास होता था।किंतु आज हम पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर केक काटते है और गिफ्ट लेते हैं।जिससे बच्चों में देने की नहीं लेने की प्रवृति का विकास हो रहा है।
आज के विज्ञान, विकास के युग में बच्चों के संस्कार घर और आसपास के समाज तक सीमित नहीं रह गए हैं। मोबाइल में भरी पड़ी कई ऐप जिनमें विश्वभर की संस्कृतियों का, रीतियों-कुरीतियों का मिश्रण, अच्छी-बुरी हर तरह की बातें बच्चों के लिए उपलब्ध हैं। वे घर से कम व बाहर से ज़्यादा सीख रहे हैं।
पता नहीं, आने वाले समय में क्या होगा। प्यार के नाम पर क्या-क्या गुल खिलेंगे…सब समय की गर्त में है। प्रेम के मस्तिष्क पर अभी कितनी बदनामी लिखी हुई है। समय ही समय पर बता पाएगा।
साधुवाद !
सादर!
*— अनीता ध्यानी ‘बयार’*
शिक्षाविद्, चिन्तक
कवयित्री व लेखिका
रा0 इ 0 का 0 लखवाड़
विकासक्षेत्र कालसी
देहरादून, उत्तराखंड।




