पुस्तक समीक्षा अलाव पर जिंदगी,संवेदनाओं का प्रज्वलित अलाव

पुस्तक समीक्षा
अलाव पर जिंदगी —कवित्री शिल्पा सोनटक्के
समीक्षा – डॉ. अलका पांडेय,मुंबई
काव्य संग्रह अलाव पर जिंदगी उन्होंने मेरे घर आकर मुझे बड़े प्रेम से भेंट की उससे मैंने पढ़ा और यही कहना चाहूंगी की जीवन जब ठिठुरती संवेदनाओं के बीच अपने लिए ऊष्मा खोजता है, तब वह किसी अलाव की ओर बढ़ता है। शिल्पा सोनटक्के का काव्य-संग्रह “अलाव पर जिंदगी” इसी मानवीय ताप, आत्मिक उजास और संवेदनशील अभिव्यक्ति का सशक्त दस्तावेज़ है।
शिल्पा जी का व्यक्तित्व जितना मृदुल और सादगीपूर्ण है, उनकी लेखनी उतनी ही गहन और मार्मिक। कम शब्दों में गहरी बात कहना उनकी विशेषता है। वे जीवन को जैसा देखती, महसूस करती और जीती हैं, उसी ईमानदारी से उसे शब्दों में ढालती हैं। कहीं स्मृतियों की कोमलता है, कहीं विरह की टीस; कहीं मौन की दार्शनिकता है, तो कहीं उत्सव के रंग।
उनकी पंक्तियाँ—
“जाने कब तक वह मुझे इस तरह याद आएगा…”
स्मृति की लंबी प्रतिध्वनि को स्वर देती हैं। वहीं—
“उड़ गए ख्वाहिशों के परिंदे सभी…”
टूटते साहस और समय की मार को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करती हैं।
“मौन का उत्सव समझेंगे क्या…” जैसी पंक्तियाँ उनके चिंतन की गहराई दर्शाती हैं, जहाँ चुप्पी भी एक सजीव संवाद बन जाती है। दूसरी ओर, होली के रंगों से सजी उनकी पंक्तियाँ जीवन के उल्लासपूर्ण पक्ष को जीवंत कर देती हैं।
यह संग्रह केवल भावनाओं का प्रवाह नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का सुसंस्कृत और संतुलित प्रस्तुतीकरण है। भाषा सहज, संवेदनाएँ स्वाभाविक और अभिव्यक्ति पारदर्शी है। “अलाव पर जिंदगी” सचमुच उन क्षणों की काव्य-ऊष्मा है, जो मन को आश्वस्त करती है।
मुझे विश्वास है कि यह कृति साहित्य-जगत में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाएगी। कवित्री को हार्दिक शुभकामनाएँ—उनकी लेखनी यूँ ही संवेदनाओं का अलाव प्रज्वलित करती रहे।





