होली हिन्दू धर्म की प्रेम और सदभाव का पर्व हैं

होली हिन्दू धर्म की प्रेम और सदभाव का पर्व हैं
प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
होली हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्यौहार हैं l जिसे फागुन माह के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता हैं l इस त्यौहार में लोग आपस में रंग फेकते हैं, पिचकारी से पानी उड़ाते हैं, और मिठाईयां खाते हैं l होली का महत्व हमारे जीवन में खुशियों और मिठास को जोड़कर एक खास स्थान रखता हैं l यह एकता, मित्रता और भाईचारे का प्रतीक हैं l
तीज त्योहारों की हमारे देश में एक लम्बी फेहरिस्त हैं l हमारे देश में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मो के लोग रहते हैं और ये सभी अपने -अपने त्योहारों को उल्लास पूर्वक मनाते हैं l सभी त्योहारों का संदेश आपस में भाई चारे और प्रेम से रहने का ही होता हैं l यूँ तो साल भर में हिन्दू लोग कई त्यौहार मनाते हैं, फिर भी इनमें रक्षाबंधन, दीपावली और होली का विशेष महत्व होता हैं l सभी लोग इन त्योहारों का बहुत बेसब्री से इंतजार करते हैं l जिस प्रकार दीपावली रोशनी का पर्व हैं l उसी प्रकार होली रंगों का त्यौहार हैं, जिसके मनाने के पीछे कई मत हैं l
यह हमारे देश का बहुत ही पुराना त्यौहार नए साल के आगमन की सूचना देता हैं l फागुन महीने के अन्त में जाड़े का अन्त हो जाता हैं l वसंत ऋतु की शोभा पूरी प्रकृति की सुंदरता बढ़ाती हैं l पेड़ – पौधों पर पंक्षियों की चहचहाट से सारा वातावरण सांगितमय हो जाता हैं l खेतो में खड़ी फसलों को देखकर किसान खुशी से नाच उठते हैं l इसी उपलक्ष्य में यह होली का त्यौहार मनाया जाता हैं l
इस त्यौहार को मनाने के पीछे प्रहलाद और होलिका की घटना भी जुडी हैं l इस कथा से सभी परिचित हैं l प्रहलाद का पिता हिरन्य कश्यप एक प्रतापी और अहंकारी राजा था l वह चाहता था कि सारी प्रजा ईश्वर के स्थान पर उसकी पूजा करें, वह अपने पुत्र प्रहलाद से भी यही इच्छा रखता था कि वह ईश्वर को छोड़ उसकी भक्ति करें लिए यधपि उस समय प्रहलाद की उम्र छोटी थी तथापि उसे सच और झूठ को पहचानने की समझ थी l
प्रहलाद ने स्पष्ट कहाँ कि ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं हो सकता l माता – पिता ईश्वर से बढकर हैं और सदा आदर के पात्र हैं l परन्तु भक्ति तो केवल ईश्वर की होती हैं l हिरन्य कश्यप को पुत्र की यह बात बहुत ख़राब लगी, और उसने प्रहलाद को बहुत डराया धमकाया l परन्तु प्रहलाद के विचारों में कुछ बदलाव नहीं आया l अंत में पिता ने ही पुत्र की प्राण लेने का निश्चय किया , और उसने प्रहलाद को मारने के कई उपाय किए l लेकिन उसके सभी उपाय निषफल होते चले गए l प्रहलाद अपनी ईश्वर भक्ति पर अडिग रहा l
आखिर में उसने अपनी बहन होलिका की मदद ली l होलिका को वरदान था कि वह कभी आग में नहीं जलेगी l हिरन्य कश्यप के कहने पर होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई l भगवान की महिमा अपरम्पार थी l होलिका आग में जलकर भस्म हो गई और प्रहलाद बच गया l अत: असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय की विजय को दर्शाता हैं होली का त्यौहार l तब से यह पर्व हर साल बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं l
होली पर्व का आरम्भ जिस कारण भी हुआ हो लेकिन इसमें संदेह नहीं कि यह हमारा प्राचीन पर्व हैं l हमारे कई साहित्य ग्रंथो की जनता इसे मनाती हैं l इस पर्व में धार्मिक कार्यों और बिधि विधान का उतना महत्व नहीं हैं, जितना रंग ग़ुलाल और गाने -बजाने का होता हैं l इसी पर्व में सभी चाहे अमीर हो या गरीब सदभाव से एक – दूसरे से गले मिलते हैं l इस त्यौहार की मुख्य घटना होलिका दहन हैं, और इसकी तैयारी भी बहुत पहले से शुरु हो जाती हैं l
ग्रामीण क्षेत्र से लेकर बाजार तथा शहरों में भी होलिका दहन किया जाता हैं l जैसे ही फागुन की पूर्णिमा का दिन आता हैं, लोगों में उत्साह बढ़ता हैं l होलिका दहन के दूसरे दिन रंगोत्सव मनाया जाता हैं l जिसे देखों वहीं रंगों में सरोबार मिलता हैं l बच्चें – बूढ़े, महिला – पुरुष सभी लोग रंगों के इस त्यौहार को नाच – गाकर आनंद उठाते हैं l सभी लोग दिल खोलकर होली खेलते हैं l रंग, ग़ुलाल और अबीर से सारी धरती रंगीन हो उठती हैं l
इस दिन सभी लोग जात – पात , ऊँच – नीच और छोटे – बड़े का भेदभाव भुलाकर लोग आपस में गले मिलते हैं l देश भर में प्रेम और सदभाव की झलक दिखाई देती हैं l इस दिन लोग अपने दिल से नफरत और वैमनस्य भुलाकर अपने दुश्मनों को भी गले लगाते हैं l लोग टोलियां बनाकर ढ़ोल – मंजीरा बजाते और नाचते -गाते हुए घर – घर जाते हैं l
नौजवानों की टोलियो की तो रंगत ही निराली होती हैं l खासकर दोपहर के बाद होली का कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं l जिसमें हास्य कवि सम्मेलन और हास्य कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं l होली पर्व आपस में प्रेम से मिल जुलकर और भाईचारे से रहने का संदेश देता हैं l इस पर्व में जहाँ एक ओर मस्ती का शुमार रहता हैं, तो दूसरी ओर पिछले कई वर्षो से इस त्यौहार में कुछ बुराइयाँ भी जोर पकड़ने जा रही हैं l जो इस पर्व की पवित्रता को ठेस पहुँचाती हैं l
होली के दिन कई बीमार मानसिकता वाले लोग अपने गलत कामों द्वारा इस त्यौहार का मजा बिगाड़ देते हैं l ये लोग बेवजह अपरिचित लोगों का उपहास उड़ाते हैं, और अपना द्वेष मिटाने के लिए अपने परिचितों से भी लड़ाई – झगड़ा करते हैं l कुछ कुप्रवृति वाले नौजवान भी इस दिन लड़कियों से छेड़छाड व बदत्तमीजी करते हैं और सामाजिक वातावरण को प्रदूषित करते हैं l कुछ अहंकारी लोग अपनी ताकत दर्शाने के लिए कमजोर को बेवजह मारते – पिटते हैं, जो कि एक निंदनीय कृत्य हैं l ऐसी बीमार मानसिकता वाले लोग होली पर्व की सार्थकता और संदेश से अज्ञान होते हैं, और न ही उनको इस त्यौहार की पवित्रता से कोई लेना – देना होता हैं l वे तो बस अपनी मौके का फायदा उठाने में लगे रहते हैं l
आज अगर देखा जाय तो इस पर्व की गरिमा को ठेस पहुंची हैं l इसी कारण समझदार लोग अपने सिमित दायरे में ही इस त्यौहार को खेलना पसंद करते हैं l हो भी क्यों न, जब कोई नशे में धूत व्यक्ति आपको बेवजह परेशान करें तो इससे अच्छा हैं कि हम दूर ही हो जाय l यह ठीक ही कहाँ गया हैं कि जब टोलियों में मेल न हो तो होली का मजा नहीं रह जाता l
आज यदि हमें इस त्यौहार – पर्व की परम्परा और गरिमा को बचाना हैं तो सबसे पहले हम सभी को अपने दिलों से अहंकार का त्याग करना होगा l साथ ही छल और कपट से दूर रहना होगा, जो कि व्यक्ति को कुमार्ग की ओर धकलते हैं l सभी को अपने अंदर साहस और संकल्प को आत्मसात करना चाहिए l प्रहलाद के संकल्प और पराकर्म ने ही हिरन्य कश्यप जैसे प्रतापी और घमंडी राजा का घमंड चूर – चूर कर दिया l इसलिए हमें भी समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए एकजुट होकर सामने आना चाहिए l
इस पर्व की पवित्रता तभी बनी रह सकती हैं l जब हम सभी अपने दिलों से ईर्ष्या व द्वेष – भाव को छोड़ एक दूसरे के साथ प्रेम – प्यार से रहें और सामुदायिकता को बढ़ावा दे l जिससे हम सभी को सुरक्षित व स्वस्थ समाज मिलेगा l अत : होली के इस पर्व पर हमें संकल्प करना चाहिए कि समाज में फैली हुई सामाजिक बुराइयाँ जैसे सांप्रदायिकता, अस्प्रीश्यता या ऊच – नीच को दूर भगाएंगे, और इस रंगोत्सव को कभी फीका नहीं होने देंगे l




