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एक वोट की ताकत : आभासी संगोष्ठी में जागी लोकतांत्रिक चेतना

‘शब्दभूमि प्रकाशन’ एवं ‘जागो टीवी’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में मतदान को अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य बताया गया

शब्दभूमि प्रकाशन एवं जागो टीवी के संयुक्त तत्वावधान में 13 अप्रैल को एक महत्वपूर्ण वोटर जागरूकता आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोकतंत्र में मतदान के महत्व को रेखांकित करना तथा नागरिकों, विशेषकर युवाओं और शिक्षित वर्ग को मतदान के प्रति जागरूक करना था।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रभावशाली पंक्तियों से हुई “लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई…”

जिसने पूरे संवाद का भावात्मक आधार तय किया। मुख्य वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तभी बनी रहती है जब जनता सक्रिय रूप से भागीदारी करे। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में 1946 के सियालकोट जनमत संग्रह का उदाहरण प्रस्तुत किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के मतदान न करने के कारण ऐतिहासिक परिणाम सामने आए। इस उदाहरण के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि एक छोटी-सी लापरवाही भी भविष्य की दिशा बदल सकती है। वक्ताओं ने विशेष रूप से शहरी और शिक्षित वर्ग की कम मतदान भागीदारी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि “अगर आप निर्णय नहीं लेंगे, तो निर्णय आपके लिए कोई और लेगा।” कार्यक्रम में यह भी स्पष्ट किया गया कि मतदान किसी व्यक्ति या दल विशेष के समर्थन का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती का प्रश्न है। सभी नागरिकों से अपील की गई, “किसी को भी वोट दीजिए, लेकिन वोट अवश्य दीजिए।”

इस अवसर पर मुख्य वक्ताओं में अंजू मनोत, डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी, केयूर मजूमदार, अल्पना सिंह, सुशील कुमार पाण्डेय, रचना सरन, सुरेंद्र सिंह (कोलकाता), डॉ. रुचि पालीवाल (उदयपुर), आशीष अंबर (दरभंगा), किरण कुमारी (भागलपुर), डॉ. सुषमा हंस (रानी बिरला गर्ल्स कॉलेज) एवं बड़ी संख्या में श्रोता शामिल रहे।

कार्यक्रम का संचालन प्रिया श्रीवास्तव ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन विनोद यादव द्वारा प्रस्तुत किया गया।

संगोष्ठी का निष्कर्ष स्पष्ट था- एक वोट केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के भविष्य का निर्णय है।

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