दायरों से बाहर पुस्तक-समीक्षा

कवयित्री रीतु रूत द्वारा रचित लघुकविता संग्रह “‘दायरों से बाहर” हिन्दी कविताओं का अनूठा संग्रह है जो उनकी गहन साहित्यिक चेतना का परिचय देता है। इस संग्रह की लघुकविताओं में लेखिका ने निजी संवेदनाओं, प्रकृति और परिवेश, नारी जीवन के अनकहे पहलू ,समाज और परम्पराओं के सूक्ष्म अनुभव को उकेरा है। इस संग्रह की कविताएँ विचार प्रधान कविताएँ हैं जो पाठक को चिंतन कि ओर अग्रसर करती हैं। इस पुस्तक में नारी विमर्श, प्रकृति और समाज के अनदेखे पहलू उभर कर समक्ष आते हैं।कहीं-कहीं तो पाठक को लगता है जैसे वह अपनी कहानी का अध्याय पढ़ रहा हो। रीतु रूत का काव्य-संसार कल्पनाओं से अधिक यथार्थ पर आधारित है। उनकी कविताएं समाज में नारी की स्थिति का दर्पण है। कहीं कोई बनावट नजर नहीं आती। अनेक कविताओं में कवयित्री समाज की,रिश्तों की और बेबसी की विडंबना को सहजता से कलमबध्द करती है। इनमें प्रकृति के सानिध्य की छवियां हैं-“दायरों से बाहर” जो इस पुस्तक की प्रथम रचना है तथा पुस्तक का शीर्षक भी है.”अकेलेपन के साथी”,”वो फूल”,”उम्मीद “,मेरे हरसिंगार “- और नारी जीवन के अनकहे पक्ष–” रंगमंच”,”गठरी”, “हाशिए पर औरत”,” आत्महत्या” जैसी मार्मिक रचनाएँ हैं। कवयित्री ने विविध विषयों पर हृदयस्पर्शी सृजन किया है। “कब समझ पाओगे”,” वो प्यारी लड़की”,”गैर बराबरी”,”भूख”,”प्रेम में टूटी स्त्रियाँ “,” सपना”बेहद ही मार्मिक रचनाएँ हैं। ”बू” ,”निशान”,”युद्ध”,”निशब्द”,
“सियासत” कविताओं में, व्यवस्था पर शांत टिप्पणी है। “बगावत”,”एक जमीन”,”कोना”,”ऐ स्त्री”अडिग रहना”, प्रेरणादायक रचनाएं हैं। आखिर कब तक में कवयित्री की गहन संवेदनाएं स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई है। कुरीतियों और रूढ़ियों की आड़ में घुटती स्त्रियों का जो शब्दचित्र लिया है। वह सराहनीय है। कई स्थानों पर मजदूर,वंचित और मुफलिसी को भी कविता का स्वर बनाया है। कवयित्री ने प्रकृति प्रेम, पुस्तक प्रेम और कविता प्रेम को भी कविताओं का आधार बनाया है तथा प्रेरणादायक विचार उकेरे हैं।
*भाषा शैली*- पुस्तक की भाषा इतनी सरल है कि साधारण आदमी भी सहजता से कविता के मर्म को समझ सकता है। छोटी-छोटी पंक्तियों में गहन विचार समाए हुए हैं। जगह-जगह पर कवयित्री के हृदय की कोमलता का परिचय मिलता है.”हरसिंगार “कविता में उदाहरण शैली का अनूठा प्रयोग है.उर्दू के सरल शब्दों का प्रयोग कविताओं का सौंन्दर्य बढ़ाते हैं।
जैसे – लम्हा,आवाम,इंतजार, छोर आदि। अरबी भाषा के शब्द, जैसे – मशगूल,कब्र और फारसी भाषा के शब्द – खुशबू, बारिश और अफ़सोस।
संस्कृतनिष्ठ शब्द – क्षितिज,उर्वरा व लालिमा तथा अंग्रेजी भाषा के शब्द- -स्टेटस,लेबल आदि का अनुपम संयोजन है। कवयित्री ने विभिन्न शैलियों का प्रयोग अपने लेखन में किया है.” टीला”,”मेरी प्यारी किताब”,”सरल” आदि रचनाओं में आत्मकथ्य शैली और “घूंघट ” में, संवादात्मक शैली दृष्टिगोचर होती है। घूंघट’ कविता में तुकबंदी देखते ही बनती है। बिंब – विधान अनेक स्थानों पर हृदयस्पर्शी है। ‘टीला’ में बिंब – विधान का बेहद सुन्दर प्रयोग है।
अनुप्रास,उपमा और अन्योक्ति अलंकार काव्य की शोभा बढ़ा रहे हैं। “मणिपुर का क्रन्दन” में समाज की अमानवीय घटना को कवयित्री ने सरल भाषा में,गीत गाती स्त्रियों का बहुत सुन्दर बिंब -विधान रचा है। यह तो तय है कि इस पुस्तक की कुछ रचनाएं अगर पढ़ ली जाए तो पाठक पूरी पुस्तक पढ़े बिना नहीं रह सकते हैं। बहुत ही प्रभावशाली विचारों से ओत-प्रोत यह काव्य-कृति है। मैं उनकी साहित्यिक यात्रा की मंगल कामना करती हूँ। सादर!
*- दर्शना दिव्यांशी*
*भैणीबादशाहपुर,*
*हिसार, (हरियाणा)*




