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दौर
दौर
दुनिया बड़ी मतलबी है,
एक दो नहीं लगभग सभी है।
जरुरत पड़ने पर रंग बदलते हैं,
रिश्ते भी फैशन के अनुसार चलते है।
अगर ढंग के कपड़े न हो,
तो सगे संबंधी भी बोलते कौन हो।
अगर चोचले बाजी न आती हो,
तो कहते गांव के अक्खड़ हो।
ठगिया आजकल सूट पहनते हैं,
अपने आगे सब को मूर्ख समझते हैं।
बनावटी बातें मिसरी सी लगती है,
समझ में आती जब जेब कटती है।
हिंदी बोलने वाले गंवार कहलाते है ,
टूटी फूटी अंग्रेजी से काम हो जाते है।
प्लीज एकच्वली का ज्यादा चलन है,
भाषा संस्कृति का नित हो रहा पतन है।
कवि संगम त्रिपाठी




