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रोया होगा काल (दोहे)

रोया होगा काल (दोहे)
अलीगंज की आग में, छात्र गवाएं प्राण।
रोया होगा काल भी, ढीला था परित्राण ।1।
‘अनामिका ‘आदित्य’ भी, हुए आग में खाख।
‘संयम’ ‘सागर’ खो दिये, हुई ‘ज्योति’ भी राख ।2।
‘सूरज’ ‘जयनिल’ है यदा, आज हुए क्यों अस्त।
ढहे ख्वाब अम्मार वे, ‘अब्दुल’ इच्छा पस्त।3।
विवश मोहम्मद का हुआ, जार जार परिवार।
हताहतों की चीख को, काश! सुनें सरकार।4।
‘चक्रवर्ती’ ‘निलेश’ का, कैसे सहे मलाल।
‘बेबस’ थे ‘रहमान’ भी, कुपित हुआ जब काल।5।
तनया ‘अनुछा’ की तड़प, चली गयी है जान।
हुई नाकाम ‘सुखमनी’, खोयी सब अरमान।6।
कितने अरमां साथ में, हुए काल के ग्रस्त।
अरे दुर्भाग्य से हुआ, भारत भविष्य त्रस्त।7।
कहें किसे बद किस्मती, आम लोग लाचार।
आशा है सरकार से, करना गौर विचार।8।
रचनाकार-अशोक दोशी ‘दिवाकर”
सिकंदराबाद



